Monday, December 14, 2009

जिम्मेदार कौन? -2

पिछले पोस्ट के आगे....
यह पोस्ट जिम्मेदार कौन? के आगे की कड़ी है उम्मीद है विषय की गम्भीरता इस पोस्ट में भी बनी रहेगी..
सेक्सवर्कर्स शब्द वेश्यावृति में संलिप्त लोगों के लिए प्रयोग में लाया जाता है जिसके पीछे तर्क यह है कि वेश्यावृति करने वाले लोग भी कामगार अर्थात `वर्कर्स´ ही होते है। परन्तु भारतीय संदर्भ में वेश्यावृति आज भी एक प्रचलित शब्द है, जिसका अंग्रेजी 'Prostitution' है जो लैटिक 'Prostare' के आधार पर बना है। वेश्यावृति आदिकाल से हमारे समाज, देश और विश्व का हिस्सा है। इसे सामाजिक स्वीकृती भी प्राप्त रही है तथा अलग-अलग जगहों पर इसे विधि और परंपरा के आधार पर उचित भी ठहराया जाता रहा है आधुनिक यांत्रिक समाज में यह हमारी विवशता, मानसिक विक्षेप, भोग विलासिता एवं निरन्तर बढ़ती हुई आंतरिक कुंठा के क्षणिक उपचार का द्योतक है, परन्तु यह हमारे विघटनशील समाज के सहज अंग के रूप में हमेशा से विधमान रही है। हमारी सामाजिक स्थिति में बदलाव जरूर आते रहे हैं। किन्तु इसका अस्तित्व अक्षुण्ण एवं अप्रभावित रहा है।
यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि आज के सेक्सवर्कर्स की मातृसंस्था वेश्यावृति की शुरूआत कैसे हुई यह माना जाता है कि यह दुनिया के सबसे पुराने पेशों (Profession) में एक है यह एक पुराना व्यापार है जिसका विकास आवश्यक्ता के कारण कम, किन्तु विवशता के कारण अधिक होता है। अलग-अलग जगहों पर इसे विधि और परम्परा के आधार पर उचित भी ठहराया जाता है इसके बावजूद इसे एक सामान्य सामाजिक संस्था के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया सेक्सवर्कर्स या वेश्यावृति के संदर्भ में एक धारणा, जो अदिकाल से चली रही है उसे आज भी समाजशास्त्री यथावत स्वीकार करते हैं की

``सेक्सवर्कर्स या वेश्यावृति हमारे समाज के लिए एक आवश्यक बुराई है।´´
पर दूसरी तरफ अक्सर ही यह भी सुनने को मिलता है कि यह वर्ग समाज का कलंक है और देह से जुड़ा यह व्यापार समाज को दुषित करता है, इससे सम्बन्धित जब भी नैतिकता, अपराध, संकट, स्वास्थ्य अथवा इसी प्रकार की दूसरी विपत्तियों की बात होती है तो हमारा समाज इनसे संवेदना व्यक्त करने के बजाय धृणा से मुंह मोड़ लेता है
अगर हम वैश्विक संर्दभ में वेश्यावृति के इतिहास की बात करें तो प्राचीन समय में वेश्यावृति का धार्मिक अनुश्ठानों से सम्बन्ध रहा है। कई ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनके अनुसार विभिन्न देशों में इसे प्रोत्साहित किया जाता रहा है। मिस्त्र, असीरिया, बेबीलोनिया, पर्शिया आदि देशों में देवियों की पूजा एवं धार्मिक अनुश्ठानों में विभिन्न वासनायुक्त तथ्यों की प्रमुखता रहती थी तथा देवस्थान भी इससे अछूते नहीं थे

वैश्विक संदर्भ में देखें तो यहूदी समुदाय इसके लिए अपवाद थे वेश्यावृति यहूदी स्त्रियों के लिए निषिद्ध थी। यह प्रवासी स्त्रियों तक ही सीमित थी। परन्तु धर्माध्यक्षों की कन्याओं के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों द्वारा नियमभंग करने पर किसी प्रकार के दण्ड का विधान नहीं था परन्तु ऐसी स्त्रियों का प्रवेश देवस्थानों और यरूसलम में वर्जित था

प्राचीन युनान में वेश्यालयों पर राज्य का अधिकार था जो क्षेत्रविशेष में सीमित थे वेश्याओं का परिधान विशिष्ट होता था तथा सार्वजनिक स्थलों पर उनका प्रवेश निषिद्ध था। वे किसी प्रकार के धार्मिक अनुश्ठान में भाग नहीं ले सकती थी परन्तु समय की गति के साथ कानुनी बाध्यताएँ टूटने लगीं और विनियमों को क्रियाशील तथा प्रभावकारी बनाए रखना प्रशासन के लिए दुश्कर होता गया देवी के मंदिर में सहस्त्रों वेश्याएँ सेविका रूप में रहती थी और देवीपूजा यौनाचार पर आवरण बन गई थी

रोम मे भी वेश्याओं की स्थिति कमोवेश यूनान की तरह ही थे। रोम में वेश्याओं के लिए पंजीकरण आवश्यक था साथ ही उन्हें राजकीय कर भी देना पड़ता था तथा भिन्न परिधान धारण करना पड़ता था

( इंतजार किजिए आगे अभी बहुत कुछ बाकी है.... )
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Thursday, November 12, 2009

सीता की आस

हे राम तुम्हारे आँगन में,
क्यों सीता का अपमान हुआ
क्या पाप किया था उसने,
जो तुने उसको दण्ड तुने उसको दिया
कर ना सके तुम उसकी रक्षा,
फिरते थे जंगल में मारे-मारे
फिर भी दण्ड मिला उसको,
तुम बन बैठे आंखों के तारे
कैसे थे तुम आदर्श पुरुष,
जो ना पवित्रता को पहचान सके
औरों का दोष मढा उस पर,
अपने को निर्दोष किया
पैरों से थी ओ भारी,
फिर भी तूने परितत्याग किया
छोड़ घने जंगल में उसको,
कैसे तूने अन्याय किया
लखन ही था तेरा भाई,
जिसने माँ जैसा सम्मान दिया
अरे तू निकला कितना कायर,
उसी के हाथों पाप किया
दया नहीं तुमको आई,
कहलाते हो दया के सागर
जब तूने अपने से ही छल किया,
हम तो हैँ सागर के गागर
कैसे आस लिए मैँ तुमहारी महिमा गाउँगी,
सीता तो समा गई धरती में, मैं धरती पर ही मर जाउंगी
हाथ ना आयी सीता तुझको, तेरे कर्मों का फल जो तुझे मिला
रोते विलखते राज किया,शीतल जल का ही आस मिला
- सुषमा सिंह

Tuesday, November 10, 2009

जिम्मेदार कौन?

विवेक विश्वासः
पिछले कई सालों से सेक्सवर्करों की दशा दिशा पर बड़े जोर -शोर से बहस जारी है। कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। कभी सामाजिक नैतिकता को लेकर तो कभी वैद्यानिक मान्यता को लेकर। परन्तु एक प्रश्न का उत्तर अभी भी अस्पष्ट है कि सेक्सवर्करों की मानसिकता एवं उनकी गतिविधियों के लिए कौन-कौन से कारक जिम्मेदार हैं। कहना गलत नहीं होगा कि यह एक सामाजिक बुराई है। बहुत सारे चिन्तकों, समाज सुधारकों ने इस विषय वर गहरी चिंता जताई है तो कुछ ने इसे समाज के लिए आवश्यक बुराई माना है।

दरअसल तमाम सामाजिक संरचना एवं नैतिकता के बीच यह समझना होगा कि आज वेश्यावृति केवल जीविकोपार्जन तक सीमित नहीं रह गयी है। आज यह भूमंडलीकरण के आवरण में ढका ग्लैमर की दुनिया में पैर फैला कर दिन-प्रतिदिन मूल प्रश्नों को और भी जटिल बनाता जा रहा है।

भारतीय संदर्भ में `सेक्सवर्कर´ महिला सेक्स व्यवसाय के लिए रूढ़ हो गया है। सेक्सवर्करों, खासकर महिला सेक्सवर्करों को लेकर वर्तमान संदर्भ में बाजारवाद और उपभोक्तावाद के प्रभाव तले मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

मीडिया एक व्यापक क्षेत्र है जो समाज, राष्ट्र, विश्व तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड में घटने वाली हर घटना को खुद में समेटे हुए है। खगोलिय घटनाओं तथा विज्ञान क्षेत्र की हलचल से लेकर मानवीय संवेदनाएँ तक कुछ भी मीडिया से अछुता नहीं है। किसी भी तरह की घटनाओं तथा सामाजिक एवं मानवीय पहलुओं को जनसामान्य की नजरों में लाने तथा देश-दुनिया में प्रचारित करने का कार्य मीडिया द्वारा आसानी से संभव हो पाता है। सेक्सवर्करों से संदभित विभिन्न तरह के अध्ययन भी लगातार होते रहते हैं, जिसमें मीडिया विश्लेशण या शोध की भी भूमिका महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

मेरे द्वारा किया गया एक अध्ययन इसी कड़ी का एक हिस्सा है, जिसमें संदर्भ क्षेत्र `सीतामढ़ी´ को आधार मान कर `वेश्यावृति´ के हर पहलु को देखने की कोशिश की गई है।
उन विभिन्न पहलुओं को आप अगले अंक में पढ़ सकेंगे......

Monday, July 27, 2009

और कारवां बदलते गए

निकले जब हम सफर पे
तो साथ साया भी न था
मगर हम चलते गए और कारवां बदलते गए।
और कारवां बदेलते गए.................
आगाज़ था जर्रा-जर्रा बिखरे थे काटें,फूलों की तरह
मगर हम उन्हें कुचलते गए। और.................
तपती धूप,सेहरा का साथ
न कोई छाया न सर पे कोई हाथ
मगर हम इन हालातों में पलते गए। और......................
खौफ़जदा थे कुछ लोग
और तमाम थे फिकरमन्द
मगर कीचड़ में कमल खिलते गए।
तिस पर भी थी तमाम निगाहें
गुबार भी था और लौ भी
मगर बढाए कदम तो पत्थर भी पिघलते गए। और....................
रुह में दौडे बाप के हुनर
मां के ख्वाब आखों में लिए
हर ख्वाब हकीकत में बदलते गए।
और.....................
दुआओं-बद्दुआओं का हुज़ूम था
निशाना आंख पे और तूफां बहुत
मगर मंजिले मिलती गयीं और कारवां बदलते गए। और.....................
नसीब के बिगडे खेल में
खूब हुई लुका-छिपी
मगर रौशन हुआ दीपक तो अंधेरे सिमटते गए।
और कारवां बदलते गए।
- संदीप कुमार वर्मा
(yesandeep@gmail.com)

Friday, March 27, 2009

एक विद्यालय ऐसा भी





विवेक विश्वासः
यह विद्यालय बिहार में नितीश सरकार की पूरी शिक्षा नीति की पोल खोलता नजर आ रहा रहा है. भले ही नितिश सरकार तथा उनके चाटुकार-कार्यकर्त्ता आत्मप्रशंसा में डूबकर चुनाव से पहले अपनी उपलब्धियाँ गिनाने में जुटे हों पर बिहार के सीतामढी जिले के कमलदह पंचायत का यह नव विद्यालय इकलौता नहीं है जिसे स्थापित हुए तीन साल या इससे अधिक समय हो गए, लेकिन आज भी वह नवस्थापित ही है. ऐसे विद्यालय से पूरा बिहार अटा परा है. यह विद्यालय अपने तरह के उन सभी विद्यालयों का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ भारत के भविष्यों की शिक्षा की शुरुआत होती है. हाँ इन भविष्यों में ब्रेड और जैम से पलने वाली पिढी जरूर शामिल नहीं है. और शायद यही कारण है कि ऐसे विद्यालयों को आधारभूत जरुरतों के लिए भी न जाने कब तक इंतजार करना परता है. चाहे चुनाव पर चुनाव होते रहें, सरकारें बदलती रहें, कुर्सी बचाने के लिए लालु-रामविलास-मुलायम जैसी तिकड़ीयां बनती और बदलती रहे, पर शायद ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का वह सपना जिसमें उन्होंने विकास का लाभ समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचाने की बात कही है पूरी हो.
वह अंतिम पंक्ति भोजन किसी तरह जुटा भी ले, फिर भी 'उपेक्षा' शायद उनकी नियती ही बन गई है चाहे शिक्षा हो या स्वास्थय एवं रोजगार. पर हम सोचने वाले इस विद्यालय को देखने के बाद यह सोच कर खुश हो सकते हैं कि अंतिम पंक्ति के बच्चों के सर पर फूस का छप्पर ही सही नसीब तो है.कल कौन जाने यह भी न बचे?

Friday, March 6, 2009

लालू की ट्रेन उनके अपने ही राज्य में


लालूजी अपने हर भाषण में खुद को गरीबों का मसिहा बताते हुए कहते हैं कि 'उन्होंने अपने पुरे कार्यकाल में न ही रेल किराया बढाकर आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाला है और न ही घाटे का रेल बज़ट पेश किया़'.पर क्या रेलमंत्री लोगों को इस हद तक बेवकूफ समझते हैं कि आम जनता उनकी बातों का सही आकलन भी नहीं कर सकती?
उन्होंने लाभ का बज़ट पेश ज़रुर किया है पर भाड़े को पिछले दरबाजे से बढाकर.आज स्थिति यह है कि ट्रेनों की संख्या बढाने के बजाए,जेनरल कोटे के सीट घटाकर तत्काल कोटे की सीट संख्या बढा दी गई है.ट्रेनों को सुपरफास्ट कर भाड़ा तो अधिक वसूला जा रहा है पर आज भी वे ट्रेनें सफ़र तय करने में उतना ही समय ले रही है जितना पहले लेती थी.ट्रेनों में भीड़ का अंदाजा उनके अपने ही राज्य के इन ट्रेन की तस्विरों को देखकर लगाया जा सकता है जो बिहार के सीतामढी जिले में ली गई है.

Monday, February 23, 2009

सर्दी की दोपहरी

सर्दी की दोपहरी में
सुशुम से नभ के नीचे
काँप रही धरती थी
शालों में लिपटी हुई
नई नवेली दुल्हन भी
घर से बाहर निकली थी
नजारे तो कुछ ऐसे थे
इस भरे वसुधा के
मानों वे तरस गये हों
थोड़ी सी धूप पाने को!

सर्दी की दोपहरी में
जरा पूछो वैसे लोगों से
जिनके शरीर पे वस्त्र नहीं
गाय,भैंस और बैल के पास भी
जलती रहती आग तो सही
मगर कुछ तो ऐसे लोग हैं
जिनके नसीब यह भी नहीं
काँप रही थरथर बदन
भुलक रहे रोयें हैं
और इस खुली आसमां के नीचे
शरद हुई वसुधा पे
ऐसे बच्चे भी सोये हैं
परिस्थितियों से मजबूर होकर
किसान सर्दी को दूर छोड़कर
हल,बैल और दो रोटी लेकर
खेत में अपने खोए हैं
टपक रहे है पसीना इनके
जैसे पानी से भिगोए हैं
हमने भी सुनी है
बहादुरी यहाँ के विज्ञान की
और एक नहीं अनेक वैज्ञानिकों के भी
नमन तो करती हूँ मैं भी
श्रद्धा से इनकी
लेकिन बस एक प्रश्न है मेरी
क्या अविष्कारें होती हैं सिर्फ
सेठ और साहुकारों के लिए ही?
-Kushboo Sinha
8 th std.
D.A.V. Public School,
Pupri,Sitamarhi

Saturday, February 21, 2009

कुछ कहती है तस्वीरें


वैसे तो हर तस्वीर कुछ कहती है.कहा जाता है की एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होता है.पर यह तस्वीरें तो शायद कुछ ज्यादा ही कहती है.
अब आप ही बताएँ इसे क्या माना जाए?
-महान भारतीय कल्चरल वैल्यू जो हर कल्चर,परम्परा,धर्म और देश का सम्मान करना जनती है?
या फ़िर
-भारतीय युवाओं के सर चढा पश्चिमी सभ्यता का बुखार?

विडम्बना

जब कोई लेकर हाथ में कटोरी!
किसी अन्य दरबार पे जाता है!!
क्या भगवान तुझे यह भाता है?
क्या भगवान...........................है?
क्या जन्म लेने से पहले भी कोई गलती कर जाता है?
फिर तू इतना क्यों अंतर दिखलाता है?
किसी की भर देता है झोली सारी!
कोई एक पैसा को भी तरस जाता है!!
किसी को देता है तू उँची-उँची इमारतें!
कोई झोपड़ी भी नहीं पाता है!!
कहीं दूध से नहाता है कोई!
कहीं पीने को भी नहीं पाता है कोई!!
क्या भगवान तुझे यह सब भाता है?
इस प्रलय भरी दुनिया में तू अब क्या प्रलय लाता है?
किसी को यहाँ से बेघर क्यों कर जाता है?
कहीं कैट्रीना,कहीं सुनामी क्यों लाता है?
इस भरी धारा को ही क्यों नहीं ले जाता है?
जो इस वसुधा पे हहाकार फैलाता है.
-Kushboo Sinha
8 th std.
D.A.V. Public School,
Pupri,Sitamarhi