Sunday, September 11, 2016

Swami Vivekananda’s Teachings Add Value to Multinational Corporations

Integrating Spirituality and Organizational Leadership Foundation (India & USA) sources its inspiration from Swami Vivekananda and is Commemorating 125th year of his Chicago Lecture by organizing World Congress on Vedic Foundations of Management Science during September 11-15, 2018 in the same hall  (now known as Fullerton Hall) and at the same venue (The Art Institute of Chicago).
The Pre Launch of the Conference took place today (September 11, 2016) amidst the presence of galaxy of dignitaries in the Conference Hall (First Floor) of Indian Institute of Public Administration. ISOL Foundation also launched the digital site of Rebuild India today.
Prof. Sunita Singh Sengupta, Founder and Conference Chair of Chicago Conference 2018 presented the background of 2018 Conference. ISOL Foundation already organized a prelude to 2018 Conference in 2015 on Swami  Vivekananda on “Spirituality for Global Economic Development”. Dr. J.L.Raina, Chairman, ISOL  Foundation  Board of Governors welcomed the speakers and guests.
 Shri Manoj Tiwari, Member of Parliament was the Chief Guest. Prof. Kapil Kapoor, Chancellor, Mahatma Gandhi International Hindi University delivered the keynote address. The Other distinguished speakers were Swami Sarvasthananda, Adhyaksha, Shri Ramakrishna Ashram, Rajkot, Ms. Padamja Ruparel, President, Indian Angels Network, Shri Hanumanta Rao Gaikawad, Founder & Managing Director, BVG India Ltd., Prof. R. Balasubramanium, Founder & President, Swami Vivekananda Youth Movement, Founder & Chairman, Grassroots Research & Advocacy Movement, Shri D.R. Kaarthikeyan, Former Director General Human Rights Commission, Shri Dilawar Singh, Director General, Nehru Yuva Kendra Sangathan, Shri Dharmesh Joshi, Founder, Rebuild India Initiative, Prof. J.K. Mitra, Former Professor and Dean, Faculty of Management Studies, University of Delhi and Chairman, ISOL Research Foundation, Dr. A.K. Merchant, General Secretary, The Temple of Understanding, India.
Some of the important dignitaries who attended the Conference were Dr. Rabi Kar, Principal, Shyam Lal College, Dr. Ruchika Ramakrishna, Shri Rajesh Jain, Shri  Sandeep Mishra, Shri Rakesh Kumar, Shri S.N.Sahu and many more. The youths were well represented.

Friday, May 13, 2016

टेलीविजन और न्यू मीडिया


(‘Television Patrakarita’ (Edited by Dharvesh Katheriya), Publisher- Shilpayan Publishers and Distributor, Delhi, Year of Publication- 2014, ISBN No.- 978-93-81610-43-5, Page No. 151-157 में प्रकाशित)
शोध-सारांश:
‘‘तकनीक रूपी चिड़िया को जब से इंटरनेट के पंख लगे हैं, इसकी उड़ान ऊंची, और ऊंची, उससे ऊंची और बस ऊंची ही होती जा रही है तथा समय के साथ इन पंखों में नए-नए रंग भरते जा रहे हैं।’’
उपरोक्त कथन आज के दौर की टेलीविजन पत्रकारिता के संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठता है। पहले जहां टेलीविजन पत्रकारिता खुद ही चमत्कार सरीखे थी, जिसने न सिर्फ शब्दों बल्कि शब्दों के साथ-साथ किसी घटना के वास्तविक दृश्यों को भी आम दर्शकों तक पहुंचाने का कार्य किया, वहीं इंटरनेट के आविष्कार के कुछ समय पश्चात ही इसकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता एवं पहुंच के विस्तार ने नए प्रतिमान स्थापित कर दिए। इंटरनेट जो न्यू मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है की उत्पत्ति दूरदृष्टि रखने वाले कुछ लोगों की सोच का परिणाम था। इसके माध्यम से व्यक्ति एक जगह बैठे-बैठे विश्व के किसी भी कोने से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकता है। जिस तरह टेलीविजन के विकास के साथ-साथ टेलीविजन पत्राकारिता भी तेजी से आगे बढ़ने लगी। उसी तरह इंटरनेट के आविष्कार के पश्चात वेब पत्राकारिता भी अस्तित्व में आया। इंटरनेट के आगमन के कुछ समय तक तो यह दोनों ही विधाएं स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करती रहीं, परंतु इंटरनेट की खूबियों और बढ़ते प्रभाव के कारण टेलीविजन को भी इंटरनेट प्लेटफॉर्म पड़ आना पड़ा, जहाँ से न्यू मीडिया के साथ टेलीविजन के गठजोड़ की शुरुआत हुई।
प्रस्तावना:
टेलीविजन के संदर्भ में कहा जाता है कि वह पद्धति जिसमें उपग्रहों की सहायता से एक शृंखलाबद्ध, आवाज युक्त दृश्यों एवं चित्रों को विद्युतीय संकेतों में बदलकर उन्हें दूर स्थिति रिसीवर को प्रेषित किया जाता है, जहां इन संकेतों को पुनः दृश्य चित्रों में बदल कर देखने लायक बना दिया जाता है, टेलीविजन कहलाता है, जबकि इंटरनेट न तो प्रोग्राम है न ही सॉफ्टवेयर, यह एक ऐसा प्लेटफार्म या स्थल है जहां से लोग विभिन्न सूचनाएं मुफ्त या क्रय कर प्राप्त कर सकते हैं। तकनीकी रूप से इंटरनेट को इस प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है कि यह एक ग्लोबल नेटवर्क है, जिसमें हजारों छोटे नेटवर्क परस्पर संपर्क के लिए प्रोटोकॉल भाषा का प्रयोग करते हैं। प्रोटोकॉल नियमों का संकलन व भाषा है जिसे नेटवर्क में परस्पर विचार-विनिमय के लिए प्रयोग किया जाता है।’’1
इंटरनेट के विधिवत शुरुआत के कुछ सालों में ही इंटरनेट की दुनिया काफी बदल गई। विश्वभर में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में लगातार वृद्धि होने लगी। एक समय मीडिया चिंतकों का मानना था कि “टेलीविजन का आविष्कार इस शताब्दी की सबसे विस्मयकारी घटना है जो आने वाली शताब्दियों में भी करोड़ों अरबों लोगों की जीवन पद्धति को न केवल प्रभावित करेगी बल्कि निर्देशित भी करेगी।“2 परंतु इंटरनेट के आगमन के साथ एक बार फिर पूरा का पूरा मीडिया परिदृश्य बदल गया, मीडिया चिंतकों को अपने पुराने विचार बदलने पड़े, क्योंकि अब इंटरनेट अपने आविष्कार को इस शताब्दी की सबसे विस्मयकारी और सनसनीखेज घटना साबित कर चूका था। अखबार, रेडियो तथा टेलीविजन जैसे परंपरागत माध्यमों में क्रमशः शब्दों को छापा जा सकता है, आवाज तथा दृश्य-श्रव्य का प्रसारण किया जा सकता है, जबकि इंटरनेट में सूचनाओं को टेक्स्ट, ऑडियो या वीडियो किसी भी रूप में प्रस्तुत करने की एक विलक्षण क्षमता है। इसके क्षमता को ध्यान में रखते हुए और कॉमर्शियल वेबसाइटों की सफलता ने जनसंचार के परंपरागत माध्यमों के व्यवसाय से जुड़े व्यवसाइयों को भी अपने-अपने वेबसाइट शुरू करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार मीडिया के एक ऐसे सवरूप ने जन्म लिया जहां एक ही जगह पर कोई खबर शब्दों में भी छपा हो सकता है, आवाज के रूप में भी उपलब्ध हो सकता है तथा उसी खबर को वीडियो के रूप में भी डाला जा सकता है। मीडिया का यह नया स्वरूप न्यू मीडिया (नव माध्यम) के रूप में अपनी पहचान बनाने लगा। न्यू मीडिया अर्थात पत्राकारिता का एक ऐसा मंच जहां एक ही जगह पर खबरों को पढ़ा, सुना और देखा जा सकता है। अब इंटरनेट द्वारा खबरों को किसी भी रूप (शब्द, श्रव्य तथा दृश्य-श्रव्य) में प्रस्तुत करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए न केवल समाचारपत्रों तथा रेडियो ने बल्कि टेलीविजन चैनलों ने भी अपने वेबसाइट्स लांच करने शुरू कर दिए और यहीं से टेलीविजन और न्यू मीडिया के गठजोड़ के रूप में एक नए युग की शुरुआत हुई।
 पेगी माइल्स और जेफ्री इटेल ने अपनी पुस्तक प्राइम साइट्स’, केबल एंड सैटेलाइट यूरोप, अक्टूबर 1996, पृ.सं.-53 पर स्थापित किया गया है कि ‘‘1996 ई. के अंत तक इंटरनेट की वेबसाइटों पर 400 से ज्यादा टेलीविजन और 1200 से ज्यादा रेडियो स्टेशन स्थापित हो चुके थे।’’3 महज साल भर के भीतर ही टेलीविजन चैनलों के वेबसाइटों की संख्या दोगुनी हो चुकी थी। 1997 ई. तक ‘‘तकरीबन आठ सौ टेलीविजन स्टेशन ने खुद का वेबासाइट बनाकर समाचार देना प्रारंभ कर दिया था।’’4 ऑनलाइन संस्करणों का यह बूम सिर्फ अमेरिका और यूरोप तक ही सीमित नहीं रहा, वरन् धीरे-धीरे यह संपूर्ण विश्व में फैल गया।
न्यू मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जिसे इंटरनेट के नाम से जाना जाता है की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह ऐसा माध्यम था जिसके प्रसार में भौगोलिक सीमाओं की कोई बाध्यता नहीं थी। इसके विपरीत टेलीविजन प्रसारण की अपनी कुछ सीमाएं थीं। ऑनएयर प्रसारण को संपूर्ण विश्व में फैले अपने दर्शकों तक पहुंचाना किसी भी चैनल के लिए इतना आसान नहीं था। अतः वैसे लोगों के लिए यह इंटरनेट बड़ा ही चमत्कारिक था जो अपने देश से बाहर अन्य देशों में रह रहे थे परंतु अपने देश और क्षेत्र की खबरें जानना और देखना चाहते थे। अब इंटरनेट के इस खूबी को जनसंचार के व्यवसाय से जुड़े व्यवसाइयों ने भुनाया। धीरे-धीरे लगभग सभी टेलीविजन चैनलों ने अपने ऑनलाइन संस्करणों की शुरूआत करनी प्रारंभ कर दी। ऑनलाइन संस्करणों की सहायता से न सिर्फ विश्व के कोने-कोने में फैले टेलीविजन समाचार चैनलों के वे दर्शक लाभान्वित हुए जो अपनी भाषा में खबरें जानना और देखना चाहते थे, बल्कि वे दर्शक भी लाभान्वित हुए जो समयाभाव की वजह से अपनी जीवनशैली और टेलीविजन चैनल पर आने वाले अपने पसंदीदा कार्यक्रमों के बीच तालमेल बिठाने में असमर्थ थे। साथ ही साथ उन चैनलों के व्यवसायिक हित भी सधने लगे। चैनलों को अपने ऑनलाइन संस्करणों के माध्यम से उन दर्शकों को अपने साथ जोड़े रखने में सहायता मिली जिन तक उसके ऑनएयर कार्यक्रम नहीं पहुंच पा रहे थे।
भारतीय टेलीविजन चैनलों ने अपने वेबसाइट्स का प्रारंभ 20 वीं सदी के पहले दशक के शुरूआत में की। जिसके माध्यम से भारतीय दर्शकों के द्वारा भी विभिन्न समाचारों को टेक्स्ट, फोटो एवं वीडियो के रूप में उपयोग किया जाता है। यहां लिखित रूप में समाचारों की विस्तृत जानकारी होती है परन्तु वीडियो के रूप में महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को छोटे-छोटे क्लिप के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जनसंचार के अन्य माध्यमों की तरह ही टेलीविजन चैनलों के वेबसाइट्स पर भी समाचारों के प्रस्तुततिकरण के समय अपने लक्षित समूह को ध्यान में रखकर ही समाचारों का चयन एवं प्रस्तुतीकरण किया जाता है।
टेलीविजन समाचार चैनलों एवं न्यू मीडिया के गठजोड़ ने समाचारों की दुनिया को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। हम सब इस तथ्य से वाकिफ हैं की पहले अगर आपको किसी अत्यावश्यक कार्य हेतु बाहर जाना आनिवार्य है परंतु आप टेलीविजन समाचार चैनल पर प्रसारित होने वाले किसी खास समाचार, किसी खास कार्यक्रम या परिचर्चा से जुड़े रहना चाहते है तो यह सामान्यतया संभव नहीं था कि आप अपने साथ टेलीविजन और केबल कनेक्शन भी साथ लेकर चलें, परंतु आज अगर आपके साथ ऐसी स्थिति आती है तो आपके पास सिर्फ एक कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन होना आनिवार्य है आप अपने पसंदीदा टेलीविजन समाचार चैनल के वेबसाईट के माध्यम से अपने पसंदीदा टेलीविजन समाचार चैनल के साथ आसानी से जुड़े रह सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि न सिर्फ आईटी क्षेत्र से जुड़े लोग और युवा पीढ़ी बल्कि टेलीविजन और न्यू मीडिया का गठजोड़ उस हर व्यक्ति के लिए फाएदेमंद है जिसके तक न्यू मीडिया की पहूँच है। व्यस्त जीवनशैली एवं बढ़ती तकनीकी निर्भरता के कारण इंटरनेट निरंतर लोकप्रिय होता जा रहा है तथा दिन-प्रतिदिन इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि हो रही है, फलस्वरूप लोगों के व्यस्त दिनचर्या के कारण टेलीविजन समाचार चैनलों के वेब संस्करण अपनी उपयोगिता सिद्ध करने में सफल रहा है। मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि को ध्यान में रखते हुए वेब पोर्टलों के शुरूआत के पश्चात् अब टेलीविजन समाचार चैनलों ने अपने-अपने मोबाइल पोर्टल भी लांच करने शुरू कर दिए हैं। भारत में भी एनडीटीवी तथा आजतक जैसे प्रमुख टेलीविजन समाचार चैनल अपने-अपने मोबाइल पोर्टल लांच कर चुके हैं।
अवलोकन प्राविधि का इस्तेमाल करते हुए मैंने यह पाया है कुछ समय पहले तक तो टेलीविजन समाचार चैनल अपने मोबाइल पोर्टलों के ऊपर विशेष ध्यान नहीं देते थे। परंतु हाल में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार स्मार्टफोन का उपयोग करने वालों की संख्या में भी तेजी से इजाफा हो रहा है और स्मार्टफोन में वीडियो स्ट्रीमिंग और न्यूज एप्लीकेशन के उपयोग की शानदार सुविधा होती है, फलस्वरूप इसे ध्यान में रखते हुए टेलीविजन समाचार चैनलों ने मोबाइल पोर्टलों को भी नए कलेवर में प्रस्तुत करते हुए बिल्कुल अप-टू-डेट रखने शुरू कर दिए हैं। वजह यह कि भले ही कोई समाचार चैनल कितना भी लोकप्रिय हो और लोग उससे गहरा जुड़ाव रखते हों, परंतु वेब पोर्टल हों या मोबाइल पोर्टल सौंदर्य बोध एक ऐसा कारण है जिसके आभाव में दर्शकों को ज्यादा समय तक एक जगह रोक कर रखना बहुत ही दुष्कर कार्य है। खासकर तब जब न्यू मीडिया लोगों को बहुत ही आसानी से एक जगह से दूसरे जगह शिफ्ट होने कि सुविधा देता है। 
न्यू मीडिया ने दर्शकों और टेलीविजन समाचार चैनलों के बीच पुल बनने का कार्य भी किया है, न्यू मीडिया के इंटरएक्टिव गुण के कारण टेलीविजन समाचार चैनल अपने वेब संस्करणों के माध्यम से लोगों के ज्यादा करीब हुआ है, क्योंकि वेबसाइट के माध्यम से दर्शक किसी समाचार या कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया तुरंत भेज सकते हैं, जिस सुविधा का टेलीविजन प्रसारण में अभाव है। फलस्वरूप समाचारों, परिचर्चाओं आदि में अपनी सहभागिता महसूस करते हैं।
 “नए मीडिया ने नयी संभावनाओं के साथ पुरानी संचार व्यवस्था, जो नियंत्रित प्रबंधन द्वारा एकसमान विचारों और सूचना का प्रसारण, निष्क्रिय जनसमूह के लिए, करता रहा है, को चुनौती दे दी है।”5
अगर हम टेलीविजन चैनलों के वेबसंस्करणों के व्यवसायिक पक्ष को देखें तो टेलीविजन चैनल की तरह इनके वेबसाइट्स पर भी वीडियो देखते समय दर्शक विज्ञापन देखने को बाध्य हैं। टेलीविजन चैनल देखते समय विज्ञापन आने पर दर्शकों को चैनल बदलने की आजादी तो होती है, परंतु अगर आप इसके वेबासाइट से वीडियो देख रहे हैं तब आप बगैर विज्ञापन देखे वीडियो को नहीं देख सकते। यहां तक कि अगर हम वीडियो के समाचार वाले हिस्से को देख रहे हैं तो हम अपनी इच्छानुसार उसे आगे बढ़ा सकते हैं परंतु वीडियो के शुरू में चलने वाले विज्ञापन को आगे बढ़ाने की सुविधा नहीं होती। यहाँ कहने का तात्पर्य यह कि न्यू मीडिया न सिर्फ दर्शकों और टेलीविजन समाचार चैनलों के बीच पुल बनने का कार्य किया है बल्कि टेलीविजन समाचार चैनलों के व्यावसायिक हितों को भी विस्तार दिया है।
कुल के बावजूद टेलीविजन समाचार चैनलों और न्यू मीडिया के गठजोड़ का भविष्य तकनीक एवं इंटरनेट की पहुंच पर निर्भर करता है और भारत सहित संपूर्ण विश्व में इंटरनेट की पहुंच अभी भी बहुत सीमित जनसंख्या तक है, इसलिए आने वाले समय में टेलीविजन समाचार चैनलों और न्यू मीडिया के अंतर्संबंध के विस्तार की असीम संभावनाएं हैं। “इस तरह से इलेक्ट्रॉनिक स्रोतों के माध्यम से पत्रकारिता की प्रवृति तेजी से बढ़ी है और ये सिलसिला कहां जाकर थमेगा अंदाज लगाना मुश्किल है।”6
टेलीविजन समाचार चैनलों और न्यू मीडिया के अंतर्संबंध के विस्तार के प्रमुख कारण हैं-
-           इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में तीव्र वृद्धि,
-           न्यू मीडिया का भौगोलिक सीमा की बाध्यता से परे होना,
-           न्यू मीडिया में ऑनएयर प्रसारण की अपेक्षा तकनीकी बाधाओं का न्यूनतम होना,
-           ऑनलाइन संस्करणों के प्रयोग हेतु आवश्यक उपकरणों की कीमतों में उत्तरोतर कमी आना,
-           न्यू मीडिया के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में रहते हुए अपने मनपसंद टेलीविजन समाचार चैनल के उपयोग की सुविधा,
-           ऑनलाइन की दुनिया में तेजी से विकसित होता बाजार,
-           महानगरीय जीवनशैली एवं लोगों की अव्यवस्थित दिनचर्या,
-           दिन-ब-दिन लोगों की तकनिकी पर बढ़ती निर्भरता,
-           टेलीविजन चैनलों की अपेक्षा ऑनलाइन संस्करणों का अधिक इंटर-एक्टिवहोना आदि।
संदर्भ सूची-
1.            कुमार, सुरेश; इंटरनेट पत्रकारिता, तक्षशिला प्रकाशन, प्रथम संस्करण: 2004, नई दिल्ली,  पृ.सं.-5
2.            झिंगरन, प्रभु; टेलीविजन की दुनिया, संस्करण: प्रथम, वर्ष: 1998, भारत बुक सेंटर, लखनऊ , पृ.सं.-01
3.            हरमन, एडवर्ड एस एवं मैकचेस्नी, राबर्ट डब्ल्यू (अनुवादक- चंद्र भूषण); भूमंडलीय जनमाध्यम : निगम पूंजीवाद के नए प्रचारक,  ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली पृ.सं-196
4.            कुमार, सुरेश, इंटरनेट पत्राकारिता, प्रथम संस्करण: 2004, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.-5
5.            रैणा, गौरीशंकर; टेलीविजन चुनौतियाँ और संभावनाएं, प्रथम संस्करण: 2012, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,  पृ.सं.-161
      6. झिंगरन, प्रभु; टेलीविजन की दुनिया, भारत बुक सेंटर, लखनऊ, पृ.सं.-209 से 210 (संस्करण: प्रथम, वर्ष: 1998)

Sunday, March 8, 2015

बिहार में छटते दिख रहे हैं राजनैतिक उथल-पुथल के बादल

"दिल्ली में त ताबड़तोड़ वोट हो रहल हईं हो, बिहार के की चल रहल हईं?" कुछ इसी तरह के सवाल लोग जगह-जगह एक दूसरे से पूछते देखे गए थे, जब कुछ दिनों पहले बिहार के उपर राजनीतिक संकट के बादल छाए थे. देश भर की नजरें दिल्ली चुनाव पर जरूर टिकी रही परंतु इसी बीच बिहार का राजनीतिक पारा भी अपने चरम पर रहा.
हर पल राजनैतिक घटनाक्रम करवट ले रही थी.  राज्य भर में हर किसी की नीगाहें मीडिया पर टिकी हुई थीं कि राजनैतिक गलियारों से पता नहीं कब, कौन सी खबर छन कर बाहर आ जाए. समान्य दिनों में जैसे-तैसे एक अखबार पढ़ने वाले लोग भी कई-कई अखबारों के पन्ने पलट रहे थे. उस दौरान लोग अखबारों के बाद टेलीविजन चैनल के माध्यम से अपनी उत्सुकता कम करने में लगे रहे. परंतु समय बीतने के साथ-साथ लोगों की उत्सुकता घटने की बजाए बढ़ती ही जा रही थी।
कभी लग रहा था कि नीतीश-मांझी मुलाकात के बाद जद (यू) और सरकार दोनों ही मझधार से निकल जाएगी, तो कभी लगता था कि राष्ट्रिय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव कोई बीच का रास्ता सुझाएंगे, तो कभी लगता था कि साईकल पर सवार हो कर कोई आयातित आइडिया ही आ जाए. परंतु सब अनुमान धरे के धरे रह गए. जनता दल (यू), भारतीय जनता पार्टी और तत्कालिन सरकार के खेवनहार, भाजपा की नई उम्मीद तथा जदयू व नीतिश कुमार के गले की फांस जीतन राम मांझी अपना-अपना खेल खेलने में लगे हुए थे. परंतु संख्या बल के सामने सब को नतमस्तक होना पड़ा. मांझी जी को अपनी सरकार बचाने की कवायद को समय से पहले विराम देना पड़ा. भाजपा की स्थिति उस टीम की तरह हो गई, जब किसी टीम का भविष्य इस बात पर टिका होता है कि आगे दो अन्य टीमों के होने वाले मैच का विजेता कौन होगा और वह बहुप्रतिक्षित मैच बारीश से धुल जाता है. जनता दल परिवार के खेमे में विजयी मुस्कान फैल गई.
इन सब के बीच आम जनता के साथ-साथ सबसे बड़ी राहत भरी सांस ली बिहार के पत्रकार बंधुओं ने, जिनका बिहार में चल रहे राजनीतिक ड्रामें के चलते पिछले एक पखवारे से अधिक समय से जीना मुहाल हो गया था. कुछ का दर्द तो यह था कि उन्होंने हफ्ते भर से अपना मोजा तक नहीं बदला था. 
लेकिन अब होली का रंग तो उतरा ही चुका है, बिहार के राजनीतिक गलियारों में भी शांति छायी हुई है.

दावों और वादों के बीच बिहार में उच्च शिक्षा का परिदृश्य

बिहार में उच्च शिक्षा की स्थिति का आकलन इससे किया जा सकता है कि अभी भी कक्षा में विद्यार्थियों की 75% प्रतिशत उपस्थिति सिर्फ कागजों तक सीमित है। कुछ राज्यों में जहां स्नातक तक के छात्रों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए बायोमीट्रीक सिस्टम लगा दिया गया है, वहीं बिहार में उच्च शिक्षा में सुधार की जो कवायद चल रही है उसमें सबसे बड़ी बाधा आधारभूत सुविधाओं की कमी के साथ-साथ कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। अब सवाल यह है कि जब शिक्षक ही नहीं हैं तो विद्यार्थी कक्षा में उपस्थित रहकर भी आखिर किसके भरोसे आसमान में सुराख करेंगे? क्या डेस्क-बेंच, कुर्सी-टेबल और दिवारों के भरोसे? शिक्षकों की संख्या में कमी का आलम यह है कि बिहार के सौ से अधिक कॉलेजों के नैक एक्रेडेशन का आवेदन नैक के द्वारा सिर्फ इसलिए वापस कर दिया गया, क्योंकि उन कॉलेजों में एक्रेडेशन के लिए आवश्यक कम से कम 12 शिक्षकों की संंख्या भी नहीं थी। यह स्थिति सिर्फ सामान्य विषयों की ही नहीं है, बल्कि तकनीकी और व्यवसायिक विषयों का हाल भी एक जैसा ही है. तकनीकी और व्यवसायिक विषयों की कक्षाएं ज्यादातर ऐसे अतिथि शिक्षकों के भरोसे संचालित की जा रही हैं, जो यूजीसी द्वारा निर्धारित न्यूनतम अहर्ताएं भी नहीं रखते.  
इतना ही नहीं पूरे बिहार में एक-दो विश्वविद्यालयों को छोड़ दिया जाये तो किसी भी विश्वविद्यालय का अकादमिक सत्र सही समय पर नहीं चल रहा है।  शिक्षकों की संख्या तो कम है ही साथ ही कहीं भवन है तो बैठने की व्यव्स्था नहीं है, कहीं भवन और बैठने की व्यवस्था है तो प्रयोगशाला संसाधनों की कमी से जूझ रहा है तथा पुस्तकालयों में एक तो किताबों की संख्या बहुत कम है और जो हैं भी उन्हें उचित प्रबंधन के अभाव में दिमक चाट रहे हैं।
यहां सरकारी और प्रशासनिक रूप से चाहे जो भी वादे और दावे किए जा रहे हों या फिर जिन वजहों से इन दावों और वादों को अमली-जामा पहनाने में दिक्कत आ रही हो परंतु यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि इन दावों और वादों के बीच विद्यार्थियों के भविष्य को जरूर सूली पर लटकाया जा रहा है.

Thursday, February 19, 2015

भारतीय राजनीति के दाव-पेंच

कहते हैं वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मूल्यों का क्षरण प्रथम विश्वयुद्ध के समय से ही शुरू हो गया था. इस संदर्भ में इतिहासकार रॉबर्ट वोल से लेकर नॉरमन कैनटर तथा एच.जी. वैल्स आदी ने लिखा भी है कि पहले विश्वयुद्ध के बाद सामाजिक संबंधों, पहनावे के साथ-साथ राजनैतिक मुल्यों में भी गिरावट दर्ज की गई.
वर्तमान दौर की भारतीय राजनीति के दाव-पेंच को देख कर यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि यह मूल्यों और विचारों को नये रूप में परिभाषित करने में लगा हुआ है. जो आप पार्टी अपना पहला चुनाव शिला दिक्षित और कांग्रेस पार्टी को पानी पी-पी कर कोसते हुये लड़ी थी, जरूरत पड़ने पर वही आप पार्टी उसी कांग्रेस के सहयोग से सरकार बना लेती है. महाराष्ट्र चुनाव में भाजपा द्वारा जिस पार्टी को ‘नेशनल करप्ट पार्टी’ करार दिया गया, जरूरत पड़ने पर उसी पार्टी के सहयोग से अपनी राजनीतिक रोटी सेकने लगी. अभी बिहार की राजनीतिक में भी रोज नये दाव-पेंच खेले जा रहे हैं, जिसमें न तो नैतिक मूल्यों के लिए कोई जगह है और न ही कोई विचार बचा है. हर पार्टी दूसरी पार्टी पर हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगा रही है. जिस राजनीति का मूल उद्देश्य सेवा और जन सरोकार होना चाहिए उसका मूल उद्देश्य कुर्सी बना हुआ है. जद (यू) भाजपा पर बिहार को राजनीतिक अस्थिरता के दलदल में धकेलने का आरोप मढ़ रही है तो भाजपा का आरोप है कि सत्ता में बने रहने के लिये जद (यू) उसी पार्टी से हाथ मिला चुकी है जिसके विरोध में जनता ने उसे जनादेश दिया है.
पर इन सब आरोप-प्रत्यारोपों से आम जनता को क्या? वह तो खुद को उस द्रौपदी के स्थिति में पाकर खूद को ठगा महसूस कर करी है जिसके किस्मत में एक के द्वारा उसे जुआ में दाव पर लगाना लिखा है तो दूसरे के द्वारा उसका चीरहरण करना.

Thursday, October 2, 2014

5th International Conference on Integrating Spirituality and Organizational Leadership


ISOL Foundation announces the 5th International Conference on Integrating Spirituality and Organizational Leadership in Chicago during September 10-15,2014
Mission
Inspired by the ideals of Sri Ramakrishna Paramahamsa of a‘Universal Religion' based on the synthesis of sectarian beliefs. He had boldly practiced Hinduism, Christianity, and Islam and was an embodiment of theoneness of different religions through profound realization of the ultimate reality. That reality beset in thecore of spirituality constitutes the common ground of all religions. The harmony of religions and realization of the spiritual elements that bind the humanity forms the cardinal principles and the driving force of ISOLFoundation. The logo depicts nine prominent religions leading to one religion - the Religion of Humanity.
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098 73 167484


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Description
The Conference ISOL Foundation- an initiative inspired by the philosophy of Sri Ramakrishna Paramahamsa, the Sage behind the great awakening in India in the latter part of 19th Century. His disciple, Swami Vivekananda made a landmark speech at the World's Parliament of Religions during September 11-27, 1893 at The Art Institute of Chicago that brought the change in the perceptions on India in the western countries. On the 122nd Anniversary of this historic lecture of Swami Vivekananda, ISOL Foundation announces the 5th International Conference on Integrating Spirituality and Organizational Leadership in Chicago during September 10-15, 2015.

Way back in 2007, the Foundation had launched a Series of International Conferences on Integrating Spirituality and Organizational Leadership. Since then, every alternate year, we have been organizing this mega event: 2007, 2009, 2011, & 2013 and 2015 is proposed to be held at Chicago.

The focus of ISOL 2015 is on “Spirituality for Global Economic Development” and aspires to again bring together the corporate leaders, academicians, representations from Governmental organizations and non - governmental organizations etc. from USA, Europe, Australia, Africa, Middle East and Asia to systematically explore the nature, determination and implications of the spiritual dimensions of global economic development. The central theme of the deliberations is to address the ethical and moral value that needs to be reinforced for a healthy business environment that is sustainable for individual, societal and economic growth.