
सुन सुन के आशिकी के तराने
पक गया है
चाँद
चाँद को बख्श दो
वो थक गया है
शक्ल जब अपने यार की
चाँद से मिलाते हैं
आसमान में चाँद मिया
देख देख झल्लाते हैं
अपनी सूरत पहचानने में
दम उनका चुक गया है
चाँद को बख्श दो
वो थक गया है
बे- बात की बात
सारी रात किया करते हैं
हाल-ए-दिल सुना कर
जबरदस्ती
चाँद का सुकून
पीया करते हैं
तन्हाई, बेवफाई, आशनाई
के किस्सों से
उसका माथा दुःख गया है
चाँद को बख्श दो
वो थक गया है
कभी दोस्त, कभी डाकिया
कभी हमराज़ बनाते हैं
उसकी कभी सुनते नहीं
बस अपनी ही सुनाते हैं
इस एकतरफा रिश्ते से
दम उसका घुट गया है
चाँद को बख्श दो ..........
- Sonal Rastogi
कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में ब्लॉग पर पूर्व में प्रकाशित