Thursday, July 31, 2014

सी-सैट के लिए आवाज मुखर करना सिर्फ फैशन तो नहीं?



                सी-सैट को लेकर चल रहे आंदोलन के पक्ष में हर कोई खड़ा हो जा रहा है। भले ही उससे किसी का सीधा सरोकार हो या नहीं हो। परंतु क्या उन सुधिजनों का ध्यान इस ओर जाता है कि झारखंड केंदीय विश्वविद्यालय (जो एक पिछड़े राज्य में स्थित है), इंद्रा गांधी राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाती विश्वविद्यालय, अमरकंटक (जिसकी स्थापना ही अनुसूचित जनजाती के लोगों को ध्यान में रखकर किया गया है), गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर (यह भी एक पिछड़ा क्षेत्र ही है) में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा को बनाने का क्या उद्देश्य और औचित्य है, जहां पर अंग्रेजी तो दूर बहुतायत लोगों को ठीक से हिंदी भी नहीं आती? ये विश्वविद्यालय तो मात्र उदाहरण भर हैं, अगर सूची तैयार की जाए तो इनकी फेहरिस्त काफी लंबी है।
          अगर हिंदी क्षेत्र में स्थित निजी विश्वविद्यालयों की बात की जाए तो ऐसा महसूस होता है जैसे भारत के भीतर ही कोई दूसरा विश्व बनाने की कोशिश की जा रही है।
          फिर सवाल यह उठता है कि विरोध का स्वर सिर्फ सी-सैट के लिए ही क्यों?
          या फिर यह मान लिया जाए कि सी-सैट के लिए आवाज मुखर करना फैशन भर है और वास्तविक मुद्दो से ऐसे लोगों का कोई सरोकार नहीं?

Wednesday, April 30, 2014

भारतीय रेलवे की विकास गाथा का श्याह सच (कुछ कहती हैं तस्वीरें- 18)



ये तस्वीरें बिहार प्रांत के सीतामढ़ी जिला मुख्यालय स्थित रेलवे परिसर की है। भले ही देश में मेट्रो सेल और मोनो रेल के माध्यम से विकास की नई कहानी गढ़ने की कोशिश की जा रही हो परंतु विश्व के सबसे बड़े रेल नेटवर्क, जिसके लिए संसद में अलग से बजट प्रस्तुत किया जाता है कि वास्तविक कहानी बयां करने के लिए ये तस्वीरें पर्याप्त हैं। विदित हो कि यह  रेलवे परिसर उन परिस्थितियों में ऐसी बदइंतजामी झेल रहा है जब न सिर्फ सीतामढ़ी रेलवे जं. को मॉडल स्टेशन बनाने की बातें लगातार होती रहती है बल्कि भौगोलिक और राजनितिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से मात्र  30-32 किलोमीटर बाद ही अंतरराष्ट्रीय सीमा प्रारम्भ हो जाती है।



Tuesday, April 1, 2014

आधुनिक विश्व में गांधी की प्रासंगिकता (कुछ कहती हैं तस्वीरें- 17)

इस तस्वीर में गांधीजी की तस्वीर टंगी दिखाई दे रही है यह तस्वीर भारत की नहीं बल्कि पड़ोसी देश नेपाल के सर्लाही जिला मुख्यालय स्थित ‘नेपाल नेत्र ज्योति संघ’ के कार्यालय की है
    ऐसा देश जो हाल-फिलहाल तक हिंसा के आग में जलता रहा है और अभी भी उस आग का धुआँ पूरी तरह से थम नहीं पाया है। जहां राजतंत्र को समाप्त कर प्रजातंत्र की स्थापना का प्रयास हिंसा के रास्ते पर चल कर ही किया गया और जहाँ की पहली प्रजातांत्रिक सरकार बंदूक के नोंक पर आजादी की लड़ाई लड़ने वाले मओवादियों की बनी, वहाँ की दीवारों पर मार्क्स या माओ की जगह अहिंसा के पुजारी मोहनदास कर्मचंद गांधी की तस्वीर एक सुखद आश्चर्य पैदा करने के साथ-साथ हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि क्या बापू द्वारा अपनाए गए अहिंसा के रास्ते का कोई भी विकल्प आधुनिक विश्व के पास है?
          अगर नहीं तब क्या विश्व समुदाय को हथियारों की होड़ से बाहर निकल कर शांतिपूर्ण विश्व की स्थापना के लिए गंभीरतापूर्वक विचार नहीं करना चाहिए?

Saturday, March 15, 2014

अरविंद केजरीवाल की खिसियाहट और वर्तमान मीडिया रुझान

संजय सिंह बघेल (https://www.facebook.com/sanjay.s.baghel.3?fref=ts&ref=br_tf) के फेसबुक वाल से-

आज जिस तरह से सभी न्यूज़ चैनल अरविंद केजरीवाल के उस बयांन के पीछे पड़ गए थे. जिसमे उन्होंने कहा था की सभी न्यूज़ चैनल बिके हुए है. और वही दिखाते है और उन्हीं की खबरें दिखाते है जहा से उनको पैसा मिलता है. कौन नहीं जानता मीडिया अब मिशन नहीं मनी में कन्वर्ट हो चूका है. जहाँ से फायदा हो उन्हीं की खबरे दिखाए. ऊपर से लगभग सभी बड़े चैनलों को यदि तो बड़े कार्पोरेट घराने चलते है या फिर किसी पार्टी के नेता. येसे में भला आप आदमी की बात कौन सुनेगा. कुछ मीडिया घरानों का सच और उनके मालिकों का विवरण इस प्रकार है.
1. आई.बी, एन-7, सी.एन,एन,-आई.बी.एन- राजेंद्र दर्डा, राज्य सभा संसद, और कांग्रेस के नेता विजय दर्डा के भाई.
2. इंडिया न्यूज़- कार्तिकेय शर्मा, काग्रेसी नेता विनोद शर्मा के बेटे और जेसिका लाल हत्या केश में तिहाड़ जेल में बंद मनु शर्मा के भाई.
३. न्यूज़ 24 - अनुराधा प्रसाद, काग्रेसी नेता राजीव शुक्ला की पत्नी और बी.जे.पी. नेता रवि शंकर प्रसाद की बहन.
4. एन.डी.टी.वी.- प्रणय राय, राधिका राय के पति और सी.पी.आई.(एम) की नेता और संसद बृंदा कारंत के जीजा.
5. टाइम्स नाऊ- टाइम्स आफ इंडियासमूह के मालिक विनीत जैन और इटालियन रोबेर्टो मिन्डो के पार्टनर. जो सोनिया गाँधी के रिश्तेदार है.
6. इंडिया टी.वी. -रजत शर्मा, बी,जी.पी. नेता अरुण जेटली के सहपाठी और छद्म रूप से साझेदार.
7. जी न्यूज़- सुभाष गोयल , जो बी.जे.पी. के फाईनेंसर है.
येसे में क्या आपको लगता है. ये आम आदमी की बात उठाएंगे और ‘आप’ जैसी पार्टी को बढ़ने देंगे?

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

Saturday, November 2, 2013

आखिर क्रिकेट में क्या रखा है?


30 अक्टूबर, 2013 को बहुत दिनों बाद क्रिकेट का पूरा मैच (भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच) देख रहा था. ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे बेवजह ही अपने जीवन का एक दिन जाया कर दिया. अब यह कहने में कोई परहेज नहीं, जो सोचता तो बहुत पहले से था पर आज सिद्दत के साथ महसूस कर रहा हूँ कि आखिर क्या वजह है कि अधिकांश विकसित देशों में क्रिकेट लोकप्रिय नहीं है? मैं कोई अर्थशास्त्री तो नहीं परंतु आज यह महसूस हो रहा है कि क्रिकेट की लोकप्रियता की वजह से होने वाले नफे-नुकसान का हिसाब-किताब राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिय.
हो सकता है ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार के दृष्टिकोण से भारतीय बाजार के फ्रेम में क्रिकेट बिलकुल फिट बैठता हो, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि क्रिकेट हमारे देश की कार्यक्षमता को वृहद् रूप से प्रभावित करता है. अगर क्रिकेट के एकदिवसीय फॉर्मेट के आधार पर बात करें तो लगभग नौ घंटे करोड़ों लोग टेलीविजन सेटों से चिपके रहते हैं. अब नौ घंटे में करोड़ों लोगों द्वारा संपादित कार्यों का उत्पादित परिणाम कितना हो सकता है इसका सही-सही आँकलन तो किसी अर्थशास्त्री या सक्षम एजेंसी द्वारा ठीक-ठीक किया जा सकता है परंतु एक सामान्य आँकलन तो कोई भी व्यक्ति कर सकता है. बात इतने में भी खत्म हो जाए तब भी ठीक है परंतु खेल के समाप्ति के पश्चात भी घर से लेकर ऑफिस तक और स्कूल/कॉलेज जाते बच्चों के बीच भी खेल पर घंटों परिचर्चा जारी रहती है.
अब कुछ लोग भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता और इसमें लोगों की दिलचस्पी/पसंद/नापसंद का हवाला देकर मेरी बातों को सीरे से खारिज कर सकते हैं या फिर मेरी आलोचना भी कर सकते हैं, परंतु मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि आखिर अबतक ज्यादातर विकसित देशों में क्रिकेट को वह लोकप्रियता क्यों हासिल नहीं है, जो लोकप्रियता इस खेल को विकासशील और पिछड़े देशों में मिल रही है? या फिर विकसित देशों की सरकारें क्यों इस खेल को प्रोत्साहित करने से अब तक परहेज कर रही है, जबकि इस खेल से भी अरबों-खरबों का बाजार जुड़ा हुआ है?
भारत सरकार को भी इस पर मंथन करने की आवश्यकता है और अगर संभव हो तो क्रिकेट के जरिए आम जनता को अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों से भटकाकर भुलावे में रखने की बजाए अपनी खेल नीति में बदलाव कर अन्य खेलों को प्रोत्साहित और लोकप्रिय बनाने की कोशिश होनी चाहिए और इसके जरिए क्रिकेट को हतोत्साहित कर देश की कार्यक्षमता का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए.