Saturday, April 27, 2013

कुछ कहती हैं तस्वीरें –13( जिम्मेदार कौन- IRCTC या फिर भारतीय रेलवे?)

यह तस्वीर इस बात का सबूत है कि IRCTC अपने उपभोक्ताओं के प्रति कितनी जिम्मेदार है या फिर कितना लेट लतीफ. वैसे तो इस तस्वीर में सम्पूर्ण विवरण उपलब्ध है, फिर भी शब्दों में भी इसकी पूरी कहानी बताता हूँ- मित्रों मै एक TDR फाइल किया था, जिसे 10 माह से अधिक बीत चुके हैं. अब तक उसका Refund under process ही बता रहा है. इस संदर्भ में मैं IRCTC को 30 मार्च को एक मेल भी किया था. जिसका IRCTC के तरफ से 5 अप्रैल को मुझे यह जवाब आया-
Dear Customer, Sorry for the inconvenience. Kindly note that your refund case of PNR No.4141915910 has been forwarded to CCM/ECR Railway on 12-Jun-2012 As refund is yet to be received from concerned railway, we have sent a reminder on 5-April-2013 with all the papers pertaining to your refund case to concerned railway. As soon as refund, if any, received it will be credited to your card account. With regards, TDR TEAM
इस मेल को आए भी तीन सप्ताह बीत चुके हैं, परंतु परिणाम अभी भी वही है- ढाक के तीन पात. अब सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है- IRCTC या फिर भारतीय रेलवे?  या फिर यह दोनों की मिली भगत है. क्योंकि पुरे देश में ऐसे पीड़ित लोगों की संख्या बहुतायत हो सकती है जिनके रुपयों को इस तरह रोक कर IRCTC या फिर भारतीय रेलवे इन रुपयों का इस्तेमाल दूसरे मदों में कर सकते हैं. भले ही उपभोक्ता परेशान हो रहा हो तो होता रहे. न जाने कब अपने भी देश में सारे सिस्टम आम जनता की सहूलियत को ध्यान में रखकर बनाया जाएगा?

Thursday, March 21, 2013

संबंध के उम्र को लेकर राष्ट्रीय परिचर्चा बनाम सरकारी एजेंडा सेटिंग


प्रस्तावित आपराधिक कानून संशोधन विधेयक के नए स्वरूप को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी दे दी गई और इसमें सहमति से यौन संबंध बनाने की मान्य उम्र को घटाया नहीं गया, इसे 18 वर्ष ही रखा गया. कहने वाले कह सकते हैं कि देश भर में ‘अचानक से  शुरू हुए राष्ट्रीय परिचर्चा’  ने अपना रंग दिखाया और सरकार दबाव में आ गई. परंतु इसका दूसरा पहलू यह है कि “खाया पिया कुछ नहीं और ग्लास तोड़ा बारह आना”. सीधे-सीधे कहा जाए तो सरकार ने शानदार तरीके से ‘एजेंडा सेटिंग थ्योरी’ का इस्तेमाल किया और पूरा देश तथा हमारी मीडिया इस एजेंडा सेटिंग के भंवर में उलझ गई. सभी समाचार पत्र/पत्रिकाओं के पन्ने इन खबरों और परिचर्चाओं से रंगने लगे कि सहमति से संबंध की उम्र 16 होनी चाहिए या 18? टेलीवजन समाचार चैनलों के हेडलाइंस, डिबेट प्रोग्राम और टॉक शो आदि भी सोलह से अठारह के बीच ही उलझी रहीं. ठीक वैसे ही जैसा सरकार चाहती थी. जबकी सरकार द्वारा पहले से ही तय था कि उसे करना क्या है. सरकारी दस्तावेज में उसे सहमति से संबंध की उम्र को 16 में बांधना है या 18 में. क्योंकि हर किसी को पता है कि वास्तविक धरातल पर इसके लिए उम्र की सीमा को बाँध पाना न कानून के बस में है और न ही कानून के निर्माताओं के. क्योंकि जब बात आपसी सहमति पर आकर ही टिकती है तो क्या आपसी सहमति होने की स्थिति में लोग कानून की अनुमति का इंतजार करेंगे? फिर हमारे देश की जो सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है उसके तहत शादी की उम्र अठारह और सहमति से संबंध की उम्र सोलह के दो अलग-अलग मानदंड कैसे संभव है?
तो क्या सरकार इतनी नासमझ है कि जिन मुद्दों पर हम सोच-विचार रहे हैं , उस पर हमारी सरकार नहीं सोची होगी? हमें सरकार को नासमझ समझने की नासमझी तो कतई नहीं करनी चाहिए. वजह यह कि सरकार द्वारा उम्र का यह खेल (18 से 16 और 16 से 18) एक सोची-समझी रणनीति के तहत खेला गया. देश और मीडिया को वास्तविक मुद्दों से भटकाने के लिए. जिससे की पूरा देश और देश की मीडिया भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी आदि प्रमुख मुद्दों को भूल कर उम्र के आंकड़ों में उलझी रहे. जिससे सरकार कुछ समय के लिए ही सही पर अपनी कमजोरियों पर पर्दा दाल सके और वह इसमें सफल भी रही.
          सरकार ने डोनाल्ड शॉ और मैक्सवेल मैक्कॉम्ब के ‘एजेंडा सेटिंग थ्योरी’ का इस्तेमाल शानदार तरीके से किया और मीडिया भी अपने ही थ्योरी के भंवर में फंसती हुई लाचार नजर आई.

Tuesday, March 12, 2013

राम सिंह के कथित आत्महत्या से उठते कुछ सवाल


राम सिंह के कथित आत्महत्या पर कुछ लोगों का कहना है कि आखिर क्यों हम उस रेप कांड के मुख्य आरोपी के मौत में इतना उलझ रहे हैं, जिसने पुरे देश को उद्वेलित कर रखा था? कई लोग कह रहे हैं कि आखिर क्यों उसके पिता द्वारा इस कथित आत्महत्या के सीबीआई जांच की मांग को स्वीकारा जाए? तो कुछ लोगों को यह भी डर है कि कहीं हर बात में मसाला ढूंढने वाले मीडिया वाले इस मौत के बाद उसके प्रति सहानुभूति कि लहर पैदा न कर दें. चलो जाने दो वैसे भी उस नरपिशाच को फांसी पर ही लटकाया जाना चाहिए था, सो खुद ही लटक लिया. धरती का बोझ हल्का हुआ, अब इस मुद्दे पर गुत्थम-गुत्थी ना करो, जाने दो और बस जाने दो.
पर क्या यह मामला इतना सीधा है कि इस मामले को बस यूँ ही जाने दिया जाए? मैं इस सवाल में नहीं उलझना चाहता या आपको उलझाना चाहता कि अगर वह मुख्य आरोपी आरोपित जघन्य अपराध का दोषी है तो उसकी सजा कितनी कड़ी होनी चाहिए थी. निसंदेह इसका निर्धारण हमारी न्यायपालिका करती.  पर क्या कुछ सवाल ऐसे नहीं हैं जिसके बारे में सोचा जाना चाहिए? जैसे-
सवाल सं 01- जैसा कि मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि उसका एक हाथ पूरी तरह सही नहीं था, ऐसी स्थिति में एक हाथ के माध्यम से क्या वह सात फीट ऊँचे रोशनदान के सहारे फांसी लगाने में सक्षम था?
           सवाल सं 02- आखिर कैसे वह दरी से रस्सी बनाया और सेल के बाकी तीन कैदियों में किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी?
           सवाल सं 03- क्या यह संभव है कि फांसी पर लटकते समय कोई व्यक्ति बिना तड़प के ही अपना प्राण त्याग दे?
अगर नहीं तो सवाल सं 04- उसके तड़पने के बावजूद बाकी के तीनों कैदियों में से कोई भी इस घटना को कैसे नहीं देख पाया?
अगर उपरोक्त सवालों में से एक में भी दम है तब इसका मतलब यह कि कुछ तो गड़बड़ है और राम सिंह की  मृत्यु सवालों के घेरे में है. और फिर इससे सवाल यह उठता है कि-
सवाल सं 05- कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार ने जेल प्रशासन की मदद से मुख्य आरोपी को ठिकाने लगाकर दिल्ली रेप कांड के बाद  देश भर में फैले गुस्से की आग पर ठंडा पानी डालने की कोशिश की है?
अगर नहीं  तो फिर सवाल सं 06- क्या बाकी के अन्य आरोपियों द्वारा मामले को हल्का करने के लिए जेल के भीतर किसी भी प्रकार से इस घटना को अंजाम दिलवाया गया?
अब उपरोक्त सवालों के बीच उमरते-घुमरते कुछ अन्य सवाल....
सवाल सं 07- क्या राम सिंह जिस मामले का मुख्य आरोपी था उसकी गंभीरता को देखते हुए जेल प्रशासन को उसकी सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी नहीं बरतनी चाहिए थी?
सवाल सं 08- क्या अब भी राम सिंह की मौत को एक संदिग्ध मौत और जेल प्रशासन के रवैये को गैर-जिम्मेदार रवैये के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए?
सवाल सं 09- क्या हम इतने यथास्थितिवादी हो गए हैं कि हर किसी मुद्दे को क्षणिक आवेग और ‘बस जाने भी दो’ के तर्ज पर सोचने लगे हैं?
आखिरी और सबसे अहम सवाल सं 10- क्या हम चुनावों में डालने वाले वोट सिर्फ वोट डालने के लिए डालते रहेंगे या हमारा वोट कभी किसी परिवर्तन की इबारत भी लिखेगा?

Tuesday, February 19, 2013

कुछ कहती हैं तस्वीरें –12 (नितीश राज के विकासगाथा की पोल खोलती कुछ तस्वीरें)


यह सीतामढ़ी शहर के बाईपास बस अड्डे को जोड़ने वाली एक मात्र पुलिया है.जिसकी जर्जर स्थिति तस्वीर के माध्यम से स्पष्ट है. जिसकी वजह से लोगों को यहाँ आधा किलोमीटर की दुरी पार करने के लिएधा घंटा से एक घंटा तक समय लग जाता है. बावजूद इसके एक अदद ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था नहीं रहती. बेवस होकर आम लोगों को खुद ही ट्रैफिक पुलिस की भूमिका निभानी पड़ती है. इसके आगे शब्दों में कहने की कुछ जरुरत नहीं, क्योंकि हम सभी जानते हैं.... एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है.





Sunday, November 4, 2012

कुछ कहती है तस्वीरें – 11 ( फेसबुक के माध्यम से राजनीति )

भले ही हमारे राज नेता और राजनीतिक पार्टियां फेसबुक के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचने की कोशिश करते रहें, परंतु निचे लगी तस्वीर को अगर गौर से देखा जाए तो स्पष्ट रूप से यह समझा जा सकता है कि फेसबुक अभी भी मात्र सिमित और खास वर्ग तक पहुँच का जरिया ही बन सकता है.  वजह साफ है कि भले ही नितीश कुमार अभी बिहार के मुख्यमंत्री हों, पर उनके इस फेसबुक पेज को लाइक करने वालों की संख्या मात्र 41114 (पोस्ट लिखे जाने तक) है, जिस संख्या बल की बदौलत किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनना तो दूर, कोई एक विधानसभा में भी निश्चित जीत का दावा नहीं कर कर सकता.
एक बड़ा सवाल तो यह भी है कि फेसबुक का प्रयोग करने वाले कितने लोग वोट डालने जाते हैं? 


Tuesday, October 23, 2012

आधुनिक प्रबंधन में वैदिक पाठ की प्रासंगिकता पर राष्ट्रीय कांफ्रेंस का आयोजन


वर्तमान समय में आधुनिक और कुशल प्रबंधन का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मानव जीवन की बढ़ती जटिलताएं प्रबंधन रणनीतिकारों के समक्ष एक वैश्विक चुनौती बनकर उभरा है। इस संदर्भ में भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और मानव संबंध की जटिलताओं को बहुत पहले ही समझ लिया था। इसलिए समग्र विकास  जैसी संकल्पना के मूल में उन्होंने व्यक्ति में आत्म नियंत्रण के साथ-साथ नैतिक एवं मूल्यपरक गतिविधियों पर अधिक जोर दिया।
उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए आधुनिक प्रबंधन में वैदिक पाठ की प्रासंगिकता विषय पर दो दिवसीय (17-18 नवंबर 2012) राष्ट्रीय कांफ्रेंस आयोजित हो रहा है। वैदिक फाउंडेशन ऑफ इंडियन मैनेजमेंट (आइसोल रिसर्च फाउंडेशन की एक इकाई) द्वारा, तेजपुर विश्वविद्यालय, असम के बिजिनेस एडमिनिस्ट्रेसन विभाग की मेजबानी में यह राष्ट्रीय कांफ्रेंस का आयोजन किया जा रहा है। इस राष्ट्रीय कांफ्रेंस का फोकस बिंदु यह है कि वेद, उपनिषद्, पुराण, गीता और रामायण के पाठ में निहित नेतृत्व और प्रबंधन की गूढ़ बातों को आधुनिक प्रबंधकीय शैली में अपनाकर मानवीय जीवन व सांगठनिक लक्ष्यों को बहुत आसानी से कैसे प्राप्त किया जा सकता है। इस दो दिवसीय कांफ्रेंस में देश भर से प्रबंधन, राजनीति, अर्थशास्त्र, भारतीय दर्शन, मीडिया आदि विषय के विद्वानों, व्यावसायिक प्रतिनिधियों और शोधार्थियों से 30 अक्टूबर 2012 तक विस्तृत व पूर्ण आलेख आमंत्रित किए गए हैं ताकि विषय की गंभीरता के साथ न्याय किया जा सके।
हाल के वर्षों में वैश्विक मंदी ने हमारे लगभग सभी स्थापित प्रतिमानों को नए सिरे से खारिज किया है। भारतीय धार्मिक ग्रंथों में नैतिकता के पाठ को हमेशा मानवीय उद्यमिता से जोड़कर देखा गया है। नियोजन, संगठन, समन्वय, निदेशन और नियंत्रण की लोकतांत्रिक शैली को परंपरागत जीवनदृष्टि और आधुनिक प्रबंधकीय नीतियों के एकीकरण द्वारा ही विकसित किया जा सकता है। वित्तीय प्रबंधन, निर्णयन, गुणवत्ता प्रबंधन, विपणन प्रबंधन, परियोजना प्रबंधन सहित रणनीति प्रबंधन के आधार एवं शैली को भारतीय प्राचीन ग्रंथों में वर्णित पंचकोष सिद्धांत, पुरूषार्थ सिद्धांत और गुण सिद्धांत में ढूंढा जा सकता है। सीमित संसाधनों द्वारा असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति के मानवीय प्रयास बेहतर प्रबंधन के बिना असंभव है। प्राधिकार और जवाबदेही की उपयोगिता एवं महत्त्व को समझने तथा सांगठनिक जटिलताओं के निदान में वैदिक ग्रंथों को बतौर आधार ग्रंथ अपनाया जा सकता है। इन्हीं तथ्यों पर वृहद विचार मंथन इस दो दिवसीय (17-18 नवंबर 2012) राष्ट्रीय कांफ्रेंस का मूल उद्देश्य है।
कांफ्रेंस की संयोजिका प्रो. सुनीता सिंह सेनगुप्ता, संस्थापक वैदिक फाउंडेशन ऑफ इंडियन मैनेजमेंट (आइसोल रिसर्च फाउंडेशन की एक इकाई) हैं। यह कांफ्रेंस वैदिक फाउंडेशन ऑफ इंडियन मैनेजमेंट (आइसोल रिसर्च फाउंडेशन की एक इकाई) द्वारा आयोजित होने वाले कांफ्रेंसों के श्रृंखला की एक कड़ी है। इस श्रृंखला में इससे पहले 19 से 21 अप्रैल 2012 को एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस का आयोजन हरिद्वार में किया गया था तथा अगला इंटरनेशनल कांफ्रेंस का आयोजन 18 से 19 मई  2013 को मैंगलोर में होना है।