अन्ना हजारे द्वारा शुरू किए गए आमरण अनशन को समर्पित
अन्ना हजारे द्वारा शुरू किए गए आमरण अनशन के बाद हर कोई अन्ना हजारे-अन्ना हजारे किए हुए है. हम सभी इसके पक्ष में दो शब्द लिखकर खुद को प्रगतिशील साबित करने में लगे हुए हैं. पर इससे पहले हमें खुद से एक इमानदार सवाल करना चाहिए कि राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन हम कितना कर रहे हैं या फिर एक खोखले बतंगरो की जमात का हिस्सा हैं जिनका रिव्योलुशन(क्रांतिकारिता) एसी कमरों से शुरू होकर, हवाई यात्रायें करते हुए बोतल बंद पानी और शीतल पेय पदार्थों के रूप में बह जाते हैं या ब्रांडेड सिगरेट के कश से निकले धुएं में उड़ जाते हैं. इस सबके बावजूद इस 'खोखले बतंगरो की जमात' को दाद तो देनी होगी! क्योंकि एसी कमरों में रहने, हवाई यात्रायें करने, बोतल बंद पानी और शीतल पेय पदार्थों का प्रयोग करने, ब्रांडेड सिगरेट का कश लेकर धुआं उड़ाने के बावजूद जब भी इनकी जबान खुलती है या इनका कलम चलता है, इनकी जबान और कलम दोनों से सिर्फ आदिवासी, गरीब, आत्महत्या करने वाले किसान और समाज का सबसे वंचित तबका ही निकलता है. चलो शुक्र है एसी कमरों में समय गुजारने से लेकर ब्रांडेड सिगरेट का कश लेकर धुआं उड़ाने तक इन्हें यह सब याद तो रहता है.
भारत में वेश्यावृत्ति या देहव्यापार अभी भी अनैतिक देहव्यापार कानून के तहत आते हैं ।समय - समय पर इसके कानूनी मान्यता को लेकर चर्चायें गर्म होती रहती हैं । सेक्सवर्करों तथा कुछ स्वयंसेवी संगठनों के द्वारा इस तरह की मांग उठती रहती है । कुछ वर्ष पहले महिला यौनकर्मियों का कोलकाता में एक अधिवेशन हुआ जिसमें यौनकर्मियों के संगठन `नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्सवर्कर्स` ने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का फैसला किया ।
लेकिन बगैर कानूनी मान्यता के भी पूरे देश में यह कारोबार धरल्ले से चल रहा है। देश में आज कुल ग्यारह सौ सत्तर रेड लाईट एरिया है।इसमें व्यापारिक दृष्टिकोण से सबसे ज्यादा धंधा वाला एरिया है कोलकात्ता और मुम्बई।एक आकड़े के अनुसार करोड़ों रूपयो का साप्ताहिक बाज़ार है अकेले मुम्बई का रेडलाईट एरिया।राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा एक ऐसा क्षेत्र है जहां देह व्यापार की प्रथा का एक लम्बा इतिहास है । इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो पहले जो ` मुजरा ´तथा नाच - गानों के केन्द्र के रूप में जाने जाते थे वही बाद में वेश्यावृत्ति के अड्डों के रूप में मशहूर हो गए।
एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में यौनकर्मियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही हैं । 1997 में यौनकर्मियों की संख्या 20 लाख थी जो 2003-04तक बढ़कर 30 लाख हो गई।2006 में महिला और बाल विकास विभाग द्वारा तैयार रिपोर्ट में यह भी पाया गया था कि देश में 90 फीसदी यौनकर्मियों की उम्र 15 से 35 साल के बीच है ।
ऐसे भी मामले देखने में आए हैं जिसमें झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तरांचल में 12 से 15 वर्ष की कम उम्र की लड़कियों कोभी वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है । पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकात्ता से सटादक्षिण24 - परगना ज़िले के मधुसूदन गांव में तो वेश्यावृत्ति को ज़िन्दगी का हिस्सा माना जाता है।सबसे दिलचस्प बात यह है कि वहां के लोग इसे कोई बदनामीनहीं मानते।उनके अनुसार यह सब उनकी जीवनशैली का हिस्सा है और उन्हें इस पर कोई शर्मिंन्दगी नहीं है। इस पूरे गांव की अर्थव्यवस्था इसी धंधे पर टिकी है ।
देश में रोजाना 2000 लाख रूपये का देह व्यापार होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 68 प्रतिशत लड़कियों को रोजगार के झांसे में फंसाकर वेश्यालयों तक पहुंचाया जाता है । 17 प्रतिशत शादी के वायदे में फंसकर आती हैं । वेश्यावृत्ति में लगी लड़कियों और महिलाओं की तादाद 30 लाख है ।मुम्बई और ठाणे के वेश्यावृत्ति के अड्डों से तो खण्डित रूस और मध्य एशियाई देशों की युवतियों को पकड़ा गया है। भारत में वेश्यावृत्ति के बाजार को देखते हुए अनेक देशों की युवतियां वेश्यावृत्ति के जरिए कमाई करने के लिए भारत की ओर रूख कर रही हैं ।
मुम्बई पुलिस के दस्तावेजों के मुताबिक बाहर से आकर यहां वेश्यावृत्ति में लिप्त युवतियों में उज्बेकिस्तान की युवतिया सबसे ज्यादा हैं । गृह मंत्रालय के वर्ष 2007 के आंकडे़ के अनुसार भारत में तमिलनाडु और कर्नाटक देहव्यापार में शिर्ष पर हैं । 2007 के आंकडे़ के अनुसार वेश्यावृत्ति के 1199 मामले तमिलनाडु में और 612 मामले कर्नाटक में दर्ज किए गए । ये मामले वेश्यावृत्ति निवारण कानून के तहत दर्ज किए गए हैं ।
चिराग आँधियों में नहीं जलते तो क्या हुआ? आँधियों में आग की लपटें तो उठती है| सूरज बादलों में नहीं चमकता पर बादलों से बरसात तो होती है| रेगिस्तान में पानी नहीं मिलता पर रत्न तो मिलते हैं| एक हाथ से ताली नहीं बजती पर एक हाथ दोस्ती के लिये तो बढते हैं| माना कि दलदल में घर नहीं बनते पर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि कमल दलदल में ही खिलते हैं|
कठिनाइयों से कांपना, बाधाओं से हाँफना- यूवकोचित नहीं होता| युवावस्था तो नदी के प्रवाह की तरह है जिसे रोकें तो बिजली पैदा हो जाए| वरन् हमें भाग्य के भरोसे रहने के बजाए कभी हार न मानने की इच्छाशक्ति रखनी चाहिए|जरा उनके बारे में सोचिए जिनके दोनों पैर नहीं हैं, हाथ नहीं हैं या किसी न किसी रूप में अपाहिज हैं, उसकी तुलना में खुद को रख कर देखिए हम कितने सक्षम हैं| सिर्फ साँसों का रुक जाना ही मौत नहीं होती, मुश्किलों से घबराकर टूट जाना भी मौत है|
लक्ष्य प्राप्ति मायने रखता है| आलोचक को प्रशंसक बनते देर नहीं लगती| हमें लक्ष्य के साथ जिन्दा रहना चाहिये , लक्ष्य विहिन होकर नहीं| वृक्षमें फल नहीं लगे तो क्या हुआ उसके तने का फर्नीचर बनाना ही क्या कम है|
सूरज का बादलों से झांकना ही क्या कम है, कम से कम दिन का आभास तो करा ही देता है|
ए.के.हंगल याद हैं आपको! उनका कर्ममय जीवन बहुआयामी रहा है. वह स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं. शिखर अभिनेता का जीवन जिया है उन्होंने. रंगमंच, टीवी. और फिल्म तीनों में. लगभग दो सौ फिल्मों में काम किया है. भारतीय जन नाट्य संघ(इप्टा) के सूत्रधारों में रहे हैं. विचारसंपन्न हैं. वामपंथी विचारधारा उन्हें अपना सहचर मानती है. इंसानियत की जीवन भर पैरोकारी की है. इसकी भरपूर कीमत भी चुकाई है और चुका रहे हैं. अनेक फिल्मों में चरित्रनायक की भूमिका निभाई. वही अवतार कृष्णहंगल इन दिनों गंभीर रूप में बीमार हैं. 95 वर्ष की उम्र में वह चरम आर्थिक संकट भी झेल रहे हैं. 44 वर्ष उन्होंने फिल्म उद्योग को दिए, लेकिन फिल्म बिरादरी का कोई व्यक्ति उनका हालचाल जानने नहीं गया. वाम बिरादरी ने भी कोई खोज-खबर नहीं ली, जबकि दो राज्यों में उनकी सरकारें हैं. न जन नाट्य संघ, न प्रगतिशील लेखक महासंघ, न जनवादी लेखक संघ, न जन संस्कृतिमंच, न संगीत नाटक अकादमी, न राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, यानी किसी ने भी आर्थिक-शारीरिक संकट से जूझ रहे अप्रतिम कलाकार की सुधि नहीं ली. चरम उपभोगवादी सत्ता तो हर कदम अपने फायदे के लिए उठाती है. अब हंगल की देखभाल से उनको क्या फायदा? फिर भी हंगल ने गहरी उदासी में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को मदद के लिए लिखा. लेकिन कोई पावती तक नहीं मिली, जबकि हंगल संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के सेनानी भी थे. इस आंदोलन में उनकी पत्नी मनोरमा जेल गई थीं. यह हाल है पुरोगामी राज्य की सरकार का. वाम सरकारों ने भी फिक्र नहीं की. सरकारों का यही चरित्र है. लेकिन समाज! समाज ने भी कुछ नहीं किया. फिल्मी समाज में हंगल के वैचारिक रुझान वाले कम नहीं हैं. सब समर्थ हैं, लेकिन आत्मलोलुप. सिर्फ आशा पारेख और कुछ गिने-चुने लोग मदद को आए. ऐसा समाज मृतही कहा जाएगा. हंगल कहते हैं कि बुजुर्ग कलाकारों की देखरेख राज्य का दायित्व है.वे जब सोवियत रूस गए थे तो वहां देखा कि उम्रदराज कलाकारों को बंगले में सारी सुविधाओं के साथ रखा जाता था. लेकिन देश की दिल्ली और राज्यों की दिल्लियां तो स्वार्थ की गढ है. उन्हें हंगल के जीवन से क्या काम?
( नागपुर से प्रकाशित 'लोकमत समाचार' से साभार)
*मेरे ब्लॉगपर प्रकाशित किए जाने तक अभिनेता आमिर खान द्वारा भी सहयोग की ख़बरें आई हैं.