यह सीतामढ़ी
शहर के बाईपास बस अड्डे को जोड़ने वाली एक मात्र पुलिया है.जिसकी जर्जर स्थिति तस्वीर के माध्यम से स्पष्ट
है. जिसकी वजह से लोगों को यहाँ आधा किलोमीटर की दुरी पार करने के लिए आधा घंटा से एक
घंटा तक समय लग जाता है. बावजूद इसके एक अदद ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था नहीं रहती. बेवस
होकर आम लोगों को खुद ही ट्रैफिक पुलिस की भूमिका निभानी पड़ती है. इसके आगे शब्दों
में कहने की कुछ जरुरत नहीं, क्योंकि हम सभी जानते हैं.... एक तस्वीर हजार शब्दों
के बराबर होती है.
Tuesday, February 19, 2013
Sunday, November 4, 2012
कुछ कहती है तस्वीरें – 11 ( फेसबुक के माध्यम से राजनीति )
भले ही
हमारे राज नेता और राजनीतिक पार्टियां फेसबुक के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचने की
कोशिश करते रहें, परंतु निचे लगी तस्वीर
को अगर गौर से देखा जाए तो स्पष्ट रूप से यह समझा जा सकता है कि फेसबुक अभी भी
मात्र सिमित और खास वर्ग तक पहुँच का जरिया ही बन सकता है. वजह साफ है कि भले ही नितीश
कुमार अभी बिहार के मुख्यमंत्री हों, पर उनके इस फेसबुक पेज
को लाइक करने वालों की संख्या मात्र 41114 (पोस्ट लिखे जाने
तक) है, जिस संख्या बल की बदौलत किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनना
तो दूर, कोई एक विधानसभा में भी निश्चित जीत का दावा नहीं कर कर सकता.
एक बड़ा
सवाल तो यह भी है कि फेसबुक का प्रयोग करने वाले कितने लोग वोट डालने जाते हैं?
Tuesday, October 23, 2012
आधुनिक प्रबंधन में वैदिक पाठ की प्रासंगिकता पर राष्ट्रीय कांफ्रेंस का आयोजन
वर्तमान
समय में आधुनिक और कुशल प्रबंधन का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मानव
जीवन की बढ़ती जटिलताएं प्रबंधन रणनीतिकारों के समक्ष एक वैश्विक चुनौती बनकर
उभरा है। इस संदर्भ में भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और मानव संबंध की जटिलताओं को
बहुत पहले ही समझ लिया था। इसलिए समग्र विकास
जैसी संकल्पना के मूल में उन्होंने व्यक्ति में आत्म नियंत्रण के साथ-साथ
नैतिक एवं मूल्यपरक गतिविधियों पर अधिक जोर दिया।
उपरोक्त
को ध्यान में रखते हुए आधुनिक प्रबंधन में वैदिक पाठ की प्रासंगिकता विषय पर दो
दिवसीय (17-18 नवंबर 2012) राष्ट्रीय कांफ्रेंस आयोजित हो रहा है।
वैदिक फाउंडेशन ऑफ इंडियन मैनेजमेंट (आइसोल रिसर्च फाउंडेशन की एक इकाई) द्वारा, तेजपुर
विश्वविद्यालय, असम के बिजिनेस एडमिनिस्ट्रेसन विभाग की
मेजबानी में यह राष्ट्रीय कांफ्रेंस का आयोजन किया जा रहा है। इस राष्ट्रीय
कांफ्रेंस का फोकस बिंदु यह है कि वेद, उपनिषद्, पुराण, गीता और रामायण के पाठ में निहित नेतृत्व और
प्रबंधन की गूढ़ बातों को आधुनिक प्रबंधकीय शैली में अपनाकर मानवीय जीवन व सांगठनिक
लक्ष्यों को बहुत आसानी से कैसे प्राप्त किया जा सकता है। इस दो दिवसीय कांफ्रेंस
में देश भर से प्रबंधन, राजनीति, अर्थशास्त्र,
भारतीय दर्शन, मीडिया आदि विषय के विद्वानों, व्यावसायिक
प्रतिनिधियों और शोधार्थियों से 30 अक्टूबर 2012 तक विस्तृत व पूर्ण आलेख आमंत्रित किए गए हैं ताकि विषय की गंभीरता के
साथ न्याय किया जा सके।
हाल
के वर्षों में वैश्विक मंदी ने हमारे लगभग सभी स्थापित प्रतिमानों को नए सिरे से
खारिज किया है। भारतीय धार्मिक ग्रंथों में नैतिकता के पाठ को हमेशा मानवीय
उद्यमिता से जोड़कर देखा गया है। नियोजन, संगठन,
समन्वय, निदेशन और नियंत्रण की लोकतांत्रिक
शैली को परंपरागत जीवनदृष्टि और आधुनिक प्रबंधकीय नीतियों के एकीकरण द्वारा ही
विकसित किया जा सकता है। वित्तीय प्रबंधन, निर्णयन, गुणवत्ता प्रबंधन, विपणन प्रबंधन, परियोजना प्रबंधन सहित रणनीति प्रबंधन के आधार एवं शैली को भारतीय प्राचीन
ग्रंथों में वर्णित पंचकोष सिद्धांत, पुरूषार्थ सिद्धांत और
गुण सिद्धांत में ढूंढा जा सकता है। सीमित संसाधनों द्वारा असीमित आवश्यकताओं की
पूर्ति के मानवीय प्रयास बेहतर प्रबंधन के बिना असंभव है। प्राधिकार और जवाबदेही
की उपयोगिता एवं महत्त्व को समझने तथा सांगठनिक जटिलताओं के निदान में वैदिक
ग्रंथों को बतौर आधार ग्रंथ अपनाया जा सकता है। इन्हीं तथ्यों पर वृहद विचार मंथन
इस दो दिवसीय (17-18 नवंबर 2012) राष्ट्रीय
कांफ्रेंस का मूल उद्देश्य है।
कांफ्रेंस
की संयोजिका प्रो. सुनीता सिंह सेनगुप्ता, संस्थापक
वैदिक फाउंडेशन ऑफ इंडियन मैनेजमेंट (आइसोल रिसर्च फाउंडेशन की एक इकाई) हैं। यह कांफ्रेंस
वैदिक फाउंडेशन ऑफ इंडियन मैनेजमेंट (आइसोल रिसर्च फाउंडेशन की एक इकाई) द्वारा आयोजित
होने वाले कांफ्रेंसों के श्रृंखला की एक कड़ी है। इस श्रृंखला में इससे पहले 19 से 21 अप्रैल 2012 को एक
इंटरनेशनल कांफ्रेंस का आयोजन हरिद्वार में किया गया था तथा अगला इंटरनेशनल कांफ्रेंस
का आयोजन 18 से 19 मई 2013 को मैंगलोर में होना
है।
Thursday, October 4, 2012
Wednesday, September 5, 2012
मैं हूं सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट
Kulwant Happy : युवा सोच युवा खयालात से साभारसरकार अपनी नाकामियों का ठीकरा मेरे सिर फोड़ रही है। मैं हूं सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट। मैं किस से कहूं अपने दिल की बात। सब कहते हैं मेरे द्वारा दुनिया भर से अपने दिल की बात। मैं दुखी हूं, जब कोई मेरे खिलाफ बयान देता है। भारतीय सरकार एवं भारतीय मीडिया तो मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं, जबकि देश की सरकार एवं कई मीडिया संस्थानों के बड़े धुरंधर मेरे पर आकर अपना उपदेश जनता को देते हैं। खुद को ब्रांड बनाने के लिए मेरा जमकर इस्तेमाल करते हैं। फिर भी आज वो ही मुझ पर उंगलियां उठा रहा है, मुझ पर आरोपों की झाड़ियां लगा रहा है, जो मीडिया कभी लिखता था मैंने कई साल पहले बिछड़े बेटे को मां से मिलवाया एवं मैंने असहाय लोगों को बोलने का आजाद मंच प्रदान किया, आज वो मीडिया भी मेरी बढ़ती लोकप्रियता से अत्यंत दुखी नजर आ रहा है। शायद उसकी ब्रेकिंग न्यूज मेरे तेज प्रसारण के कारण आज लोगों को बासी सी लगने लगी है और मेरा बढ़ता नेटवर्क उसकी आंख में खटकने लगा है।
मेरे पर मीडिया कर्मियों, नेताओं और आम लोगों के खाते ही नहीं, फिल्म स्टारों के भी खाते उपलब्ध हैं, कुछ मीडिया वालों ने तो मेरे पर लिखी जाने वाली बातों को प्रकाशित करने के लिए अख़बारों में स्पेशल कॉलम भी बना रखें हैं, जब भी देश में कोई बड़ी बात होती है तो मीडिया वाले पहले मेरे पर आने वाली प्रतिक्रियाओं का जायजा लेते हैं, मेरे पर आने वाली प्रतिक्रियाओं को स्क्रीन पर फलैश भी करते हैं।
मगर मैंने इस पर कभी आपत्ति नहीं जताई। कभी रोष प्रकट नहीं किया। मैंने कभी नहीं किया, मैं मीडिया से बड़ी हूं। मैंने कभी नहीं कहा, मैं मीडिया से तेज हूं। मैंने कभी नहीं कि मैं मीडिया से ज्यादा ताकतवर हूं। मैं तो कुछ नहीं कहा। मैं चुपचाप पानी की भांति चल रही हूं। मैं तो मीडिया आभारी हूं, जिसने शोर मचा मचाकर मुझे पब्लिक में लोकप्रिय बना। अगर मीडिया ने मुझे समाचारों में हाइलाइट न किया होता, तो मैं घर घर कैसे पहुंचती। मेरे जन्मदाता कुछ ही सालों में करोड़पति कैसे बनते?
अब मैं सोचती हूं कि मैंने ऐसा क्या कर दिया जो भारतीय सरकार एवं मीडिया मुझसे खफा होने लगा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मीडिया को लगने लगा है कि मैं पब्लिक आवाज बनती जा रही हूं। नेताओं को डर लगने लगा रहा है कहीं, मैं उनके खिलाफ जन मत या जनाक्रोश न पैदा कर दूं।
अगर सरकार एवं मीडिया वाले सोचते हैं कि मेरे बंद होने से जनाक्रोश थम जाएगा। सच्चाई सामने आने से रुक जाएगी। तो सरकार एवं मीडिया गलत सोचते हैं, मैं तो एक जरिया हूं, अगर यह जरिया या रास्ता बंद होगा तो जन सैलाब कोई और रास्ता खोज लेगा। क्यूंकि जनाक्रोश को तो बहना ही है किस न किस दिशा में, अगर सरकारें एवं मीडिया उसको नजरअंदाज करता रहेगा।
मैं तो सोशल नेटवर्किंग साइट हूं। जो पब्लिक बयान करती है, मैं उसको एक दूसरे तक पहुंचाती हूं। मेरे मालिकों को खरीद लो। मैं खुद ब खुद खत्म हो जाऊंगी। जैसे मीडिया को आप विज्ञापन देकर खरीदते हैं, उसकी आवाज को नरम करते हैं वैसे ही मेरे मालिकों की जेब को गर्म करना शुरू कर दो। वो खुद ब खुद को ऐसी युक्त निकालेंगे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। मगर सोशल नेटवर्किंग अपनी लोकप्रियता खो देगी और मैं मर जाउंगी। फिर किसी नए रूप में अवतार लेकर फिर से आउंगी। जालिम अंग्रेजों सबक सिखाने के लिए मैं तेज धार कलम बनी थी। देश विरोधी सरकारों को निजात दिलाने के लिए मैं सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट बनी हूं। अगली क्रांति के लिए मैं कुछ और बनूंगी।
मेरे पर मीडिया कर्मियों, नेताओं और आम लोगों के खाते ही नहीं, फिल्म स्टारों के भी खाते उपलब्ध हैं, कुछ मीडिया वालों ने तो मेरे पर लिखी जाने वाली बातों को प्रकाशित करने के लिए अख़बारों में स्पेशल कॉलम भी बना रखें हैं, जब भी देश में कोई बड़ी बात होती है तो मीडिया वाले पहले मेरे पर आने वाली प्रतिक्रियाओं का जायजा लेते हैं, मेरे पर आने वाली प्रतिक्रियाओं को स्क्रीन पर फलैश भी करते हैं।
मगर मैंने इस पर कभी आपत्ति नहीं जताई। कभी रोष प्रकट नहीं किया। मैंने कभी नहीं किया, मैं मीडिया से बड़ी हूं। मैंने कभी नहीं कहा, मैं मीडिया से तेज हूं। मैंने कभी नहीं कि मैं मीडिया से ज्यादा ताकतवर हूं। मैं तो कुछ नहीं कहा। मैं चुपचाप पानी की भांति चल रही हूं। मैं तो मीडिया आभारी हूं, जिसने शोर मचा मचाकर मुझे पब्लिक में लोकप्रिय बना। अगर मीडिया ने मुझे समाचारों में हाइलाइट न किया होता, तो मैं घर घर कैसे पहुंचती। मेरे जन्मदाता कुछ ही सालों में करोड़पति कैसे बनते?
अब मैं सोचती हूं कि मैंने ऐसा क्या कर दिया जो भारतीय सरकार एवं मीडिया मुझसे खफा होने लगा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मीडिया को लगने लगा है कि मैं पब्लिक आवाज बनती जा रही हूं। नेताओं को डर लगने लगा रहा है कहीं, मैं उनके खिलाफ जन मत या जनाक्रोश न पैदा कर दूं।
अगर सरकार एवं मीडिया वाले सोचते हैं कि मेरे बंद होने से जनाक्रोश थम जाएगा। सच्चाई सामने आने से रुक जाएगी। तो सरकार एवं मीडिया गलत सोचते हैं, मैं तो एक जरिया हूं, अगर यह जरिया या रास्ता बंद होगा तो जन सैलाब कोई और रास्ता खोज लेगा। क्यूंकि जनाक्रोश को तो बहना ही है किस न किस दिशा में, अगर सरकारें एवं मीडिया उसको नजरअंदाज करता रहेगा।
मैं तो सोशल नेटवर्किंग साइट हूं। जो पब्लिक बयान करती है, मैं उसको एक दूसरे तक पहुंचाती हूं। मेरे मालिकों को खरीद लो। मैं खुद ब खुद खत्म हो जाऊंगी। जैसे मीडिया को आप विज्ञापन देकर खरीदते हैं, उसकी आवाज को नरम करते हैं वैसे ही मेरे मालिकों की जेब को गर्म करना शुरू कर दो। वो खुद ब खुद को ऐसी युक्त निकालेंगे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। मगर सोशल नेटवर्किंग अपनी लोकप्रियता खो देगी और मैं मर जाउंगी। फिर किसी नए रूप में अवतार लेकर फिर से आउंगी। जालिम अंग्रेजों सबक सिखाने के लिए मैं तेज धार कलम बनी थी। देश विरोधी सरकारों को निजात दिलाने के लिए मैं सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट बनी हूं। अगली क्रांति के लिए मैं कुछ और बनूंगी।
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