Tuesday, November 10, 2009

जिम्मेदार कौन?

विवेक विश्वासः
पिछले कई सालों से सेक्सवर्करों की दशा दिशा पर बड़े जोर -शोर से बहस जारी है। कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। कभी सामाजिक नैतिकता को लेकर तो कभी वैद्यानिक मान्यता को लेकर। परन्तु एक प्रश्न का उत्तर अभी भी अस्पष्ट है कि सेक्सवर्करों की मानसिकता एवं उनकी गतिविधियों के लिए कौन-कौन से कारक जिम्मेदार हैं। कहना गलत नहीं होगा कि यह एक सामाजिक बुराई है। बहुत सारे चिन्तकों, समाज सुधारकों ने इस विषय वर गहरी चिंता जताई है तो कुछ ने इसे समाज के लिए आवश्यक बुराई माना है।

दरअसल तमाम सामाजिक संरचना एवं नैतिकता के बीच यह समझना होगा कि आज वेश्यावृति केवल जीविकोपार्जन तक सीमित नहीं रह गयी है। आज यह भूमंडलीकरण के आवरण में ढका ग्लैमर की दुनिया में पैर फैला कर दिन-प्रतिदिन मूल प्रश्नों को और भी जटिल बनाता जा रहा है।

भारतीय संदर्भ में `सेक्सवर्कर´ महिला सेक्स व्यवसाय के लिए रूढ़ हो गया है। सेक्सवर्करों, खासकर महिला सेक्सवर्करों को लेकर वर्तमान संदर्भ में बाजारवाद और उपभोक्तावाद के प्रभाव तले मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

मीडिया एक व्यापक क्षेत्र है जो समाज, राष्ट्र, विश्व तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड में घटने वाली हर घटना को खुद में समेटे हुए है। खगोलिय घटनाओं तथा विज्ञान क्षेत्र की हलचल से लेकर मानवीय संवेदनाएँ तक कुछ भी मीडिया से अछुता नहीं है। किसी भी तरह की घटनाओं तथा सामाजिक एवं मानवीय पहलुओं को जनसामान्य की नजरों में लाने तथा देश-दुनिया में प्रचारित करने का कार्य मीडिया द्वारा आसानी से संभव हो पाता है। सेक्सवर्करों से संदभित विभिन्न तरह के अध्ययन भी लगातार होते रहते हैं, जिसमें मीडिया विश्लेशण या शोध की भी भूमिका महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

मेरे द्वारा किया गया एक अध्ययन इसी कड़ी का एक हिस्सा है, जिसमें संदर्भ क्षेत्र `सीतामढ़ी´ को आधार मान कर `वेश्यावृति´ के हर पहलु को देखने की कोशिश की गई है।
उन विभिन्न पहलुओं को आप अगले अंक में पढ़ सकेंगे......

Friday, March 27, 2009

एक विद्यालय ऐसा भी





विवेक विश्वासः
यह विद्यालय बिहार में नितीश सरकार की पूरी शिक्षा नीति की पोल खोलता नजर आ रहा रहा है. भले ही नितिश सरकार तथा उनके चाटुकार-कार्यकर्त्ता आत्मप्रशंसा में डूबकर चुनाव से पहले अपनी उपलब्धियाँ गिनाने में जुटे हों पर बिहार के सीतामढी जिले के कमलदह पंचायत का यह नव विद्यालय इकलौता नहीं है जिसे स्थापित हुए तीन साल या इससे अधिक समय हो गए, लेकिन आज भी वह नवस्थापित ही है. ऐसे विद्यालय से पूरा बिहार अटा परा है. यह विद्यालय अपने तरह के उन सभी विद्यालयों का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ भारत के भविष्यों की शिक्षा की शुरुआत होती है. हाँ इन भविष्यों में ब्रेड और जैम से पलने वाली पिढी जरूर शामिल नहीं है. और शायद यही कारण है कि ऐसे विद्यालयों को आधारभूत जरुरतों के लिए भी न जाने कब तक इंतजार करना परता है. चाहे चुनाव पर चुनाव होते रहें, सरकारें बदलती रहें, कुर्सी बचाने के लिए लालु-रामविलास-मुलायम जैसी तिकड़ीयां बनती और बदलती रहे, पर शायद ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का वह सपना जिसमें उन्होंने विकास का लाभ समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचाने की बात कही है पूरी हो.
वह अंतिम पंक्ति भोजन किसी तरह जुटा भी ले, फिर भी 'उपेक्षा' शायद उनकी नियती ही बन गई है चाहे शिक्षा हो या स्वास्थय एवं रोजगार. पर हम सोचने वाले इस विद्यालय को देखने के बाद यह सोच कर खुश हो सकते हैं कि अंतिम पंक्ति के बच्चों के सर पर फूस का छप्पर ही सही नसीब तो है.कल कौन जाने यह भी न बचे?

Friday, March 6, 2009

लालू की ट्रेन उनके अपने ही राज्य में


लालूजी अपने हर भाषण में खुद को गरीबों का मसिहा बताते हुए कहते हैं कि 'उन्होंने अपने पुरे कार्यकाल में न ही रेल किराया बढाकर आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाला है और न ही घाटे का रेल बज़ट पेश किया़'.पर क्या रेलमंत्री लोगों को इस हद तक बेवकूफ समझते हैं कि आम जनता उनकी बातों का सही आकलन भी नहीं कर सकती?
उन्होंने लाभ का बज़ट पेश ज़रुर किया है पर भाड़े को पिछले दरबाजे से बढाकर.आज स्थिति यह है कि ट्रेनों की संख्या बढाने के बजाए,जेनरल कोटे के सीट घटाकर तत्काल कोटे की सीट संख्या बढा दी गई है.ट्रेनों को सुपरफास्ट कर भाड़ा तो अधिक वसूला जा रहा है पर आज भी वे ट्रेनें सफ़र तय करने में उतना ही समय ले रही है जितना पहले लेती थी.ट्रेनों में भीड़ का अंदाजा उनके अपने ही राज्य के इन ट्रेन की तस्विरों को देखकर लगाया जा सकता है जो बिहार के सीतामढी जिले में ली गई है.

Monday, February 23, 2009

सर्दी की दोपहरी

सर्दी की दोपहरी में
सुशुम से नभ के नीचे
काँप रही धरती थी
शालों में लिपटी हुई
नई नवेली दुल्हन भी
घर से बाहर निकली थी
नजारे तो कुछ ऐसे थे
इस भरे वसुधा के
मानों वे तरस गये हों
थोड़ी सी धूप पाने को!

सर्दी की दोपहरी में
जरा पूछो वैसे लोगों से
जिनके शरीर पे वस्त्र नहीं
गाय,भैंस और बैल के पास भी
जलती रहती आग तो सही
मगर कुछ तो ऐसे लोग हैं
जिनके नसीब यह भी नहीं
काँप रही थरथर बदन
भुलक रहे रोयें हैं
और इस खुली आसमां के नीचे
शरद हुई वसुधा पे
ऐसे बच्चे भी सोये हैं
परिस्थितियों से मजबूर होकर
किसान सर्दी को दूर छोड़कर
हल,बैल और दो रोटी लेकर
खेत में अपने खोए हैं
टपक रहे है पसीना इनके
जैसे पानी से भिगोए हैं
हमने भी सुनी है
बहादुरी यहाँ के विज्ञान की
और एक नहीं अनेक वैज्ञानिकों के भी
नमन तो करती हूँ मैं भी
श्रद्धा से इनकी
लेकिन बस एक प्रश्न है मेरी
क्या अविष्कारें होती हैं सिर्फ
सेठ और साहुकारों के लिए ही?
-Kushboo Sinha
8 th std.
D.A.V. Public School,
Pupri,Sitamarhi

Saturday, February 21, 2009

कुछ कहती है तस्वीरें


वैसे तो हर तस्वीर कुछ कहती है.कहा जाता है की एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होता है.पर यह तस्वीरें तो शायद कुछ ज्यादा ही कहती है.
अब आप ही बताएँ इसे क्या माना जाए?
-महान भारतीय कल्चरल वैल्यू जो हर कल्चर,परम्परा,धर्म और देश का सम्मान करना जनती है?
या फ़िर
-भारतीय युवाओं के सर चढा पश्चिमी सभ्यता का बुखार?

विडम्बना

जब कोई लेकर हाथ में कटोरी!
किसी अन्य दरबार पे जाता है!!
क्या भगवान तुझे यह भाता है?
क्या भगवान...........................है?
क्या जन्म लेने से पहले भी कोई गलती कर जाता है?
फिर तू इतना क्यों अंतर दिखलाता है?
किसी की भर देता है झोली सारी!
कोई एक पैसा को भी तरस जाता है!!
किसी को देता है तू उँची-उँची इमारतें!
कोई झोपड़ी भी नहीं पाता है!!
कहीं दूध से नहाता है कोई!
कहीं पीने को भी नहीं पाता है कोई!!
क्या भगवान तुझे यह सब भाता है?
इस प्रलय भरी दुनिया में तू अब क्या प्रलय लाता है?
किसी को यहाँ से बेघर क्यों कर जाता है?
कहीं कैट्रीना,कहीं सुनामी क्यों लाता है?
इस भरी धारा को ही क्यों नहीं ले जाता है?
जो इस वसुधा पे हहाकार फैलाता है.
-Kushboo Sinha
8 th std.
D.A.V. Public School,
Pupri,Sitamarhi